JAI BHIM AMBEDKAR AUR BUDHA


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ईरानी ब्राह्मण कथावाचक धार्मिक प्रवचनों के आड़ में मूलनिवासियों के प्रति नफरत और घृणा फैला रहे हैं। दूसरी तरफ उनके जमीन और धन की डकैती भी कर रहे हैं। ऐसा करने में वह क्यों सफल हो जा रहें हैं?
पहला कारण है कि विदेशी ब्राह्मणों ने मूलनिवासी महापुरषों को ब्राह्मण देवता में बदल दिया। उनके पूजा स्थलों को ब्राह्मण मंदिर में बदल दिया। क्योंकि मूलनिवासी परंपरा के अनुसार उन महापुरुषों और पूजा स्थलों का सम्मान करते थे और दान पारमिता के अनुसार दान देते थे, मंदिर बन जाने के बावजूद भी उन्होंने ऐसा करना जारी रखा। पहले तो उनको बचने की बातचीत के जरिए बहुत कोशिश की लेकिन ब्राह्मणों के हिंसा के कारण उन्होंने वह प्रयत्न छोड़ दिया जैसे कि आज मुसलमानों ने छोड़ दिया है। जब ब्राह्मण हिंसा के कारण मूलनिवासियों ने अपने पूजा स्थलों पर अधिकार छोड़ दिया तब उन्हें उन पूजा स्थलों पर जाना छोड़ देना चाहिए था और कोई दान भी नहीं देना चाहिए था। यह गलती इस लिए हुई कि बहुत से मूलनिवासी, विदेशी ब्राह्मणों के साथ मिल गए और बौद्ध मूलनिवासियों को ब्राह्मणों के हथियार बन कर उनको मारने लगे। इसलिए बौद्ध मूलनिवासियों ने तो मंदिर में जाना छोड़ दिया लेकिन देशद्रोही मूलनिवासी ब्राह्मणों के साथ चले गए जिसके कारण उन बौद्ध विहारों को मंदिर बनाने में ब्राह्मण कामयाब हो गए।
दूसरा काम उन्होंने मूलनिवासियों की पुस्तकों में वर्णाश्रम व्यवस्था को कहानी लिख कर उसमें घुसा दिया। एक कहानी लिखी और उसमें यह दिखाया कि मूलनिवासी राजा ब्राह्मणों के कहे अनुसार ब्राह्मणों को भगाने वाले मूलनिवासियों को पढ़ने से हिंसा के द्वारा रोक रहा है ( रामायण शंबूक प्रकरण), उनकी निंदा कर रहा है ( मृचकटिकम), उनके पूजा स्थलों को ब्राह्मण मंदिर बना रहा है ( जगन्नाथ पुरी, बालाजी मंदिर), उनकी हत्या करवा रहा है ( शशांक और शंकराचार्य के द्वारा)। मूलनिवासी महापुरुषों से वर्णाश्रम व्यवस्था का उपदेश दिलवा रहा है ( गीता में कृष्ण के द्वारा)। मूलनिवासी प्रतीकों को नष्ट किया गया और ब्राह्मण प्रतीकों को मूलनिवासी प्रतीक बता कर उसको आगे बढ़ाया गया। जिससे कि ऐसा लगे कि ब्राह्मण जीत गया है।
इन सब से यह पता चलता है कि मूलनिवासी ब्राह्मणों के हिंसा के आगे झुक गए और उन्होंने अपने आंखों के आगे ही अपनी आगे आने वाली पीढ़ियों को गुलाम बना दिया। अगर उन्होंने उनके हिंसा का मुंहतोड़ जवाब दिया होता तो मूलनिवासी देशद्रोही बन कर ब्राह्मणों के साथ नहीं जाते और मूलनिवासी राजा ब्राह्मणों को प्रश्रय भी नहीं देता। क्योंकि बौद्ध मूलनिवासियों ने हथियार डाल दिया इस कारण से समाज के कमजोर लोग और राजा ब्राह्मणों के साथ हो गये और ईरानी ब्राह्मणों की विजय हो गई।
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*#सच्च* और *सूर्य* को छिपाया नही जा सकता है।

*#नालंदा_विश्व_विद्यालय*
पुस्तकों द्वारा इस विद्यालय का वास्तविक नाम से लोगों को कोसो दूर रखा गया है।

उसका कारण यही प्रतीत होता है
कि
इसके नाम के पीछे दो सच्चाई है, जिसको साजिशन छिपाकर रखना है।

पहला सच्चाई यह छिपाना है कि आज जिस बातपर हम सभी आस्वस्त है कि *#आर्य_विदेसी* है, उसका भांडा फुट जाएगा कि
वह आर्य विदेसी नहीं होकर *#आर्य_देसी* बन जायेगा!
पालि शब्द कोष का अरिय ही *#संस्कारित* होकर आर्य बना है।
देखें चित्र को-
यह संक्रमण काल का सील है। जिसकी लिखावट में बाह्मी लिपि और नगरी लिपि दोनो का वर्ण मौजूद है। यानी संक्रमण साफ दिख रहा है।

दूसरा इस स्थल की खोज अंग्रेजों ने किया था, इस कारण यहां शिक्षा स्थली होने की वजह से इसका नाम अंग्रेजी ने नालंदा यूनिवरसिटी रखा था,
लेकिन यह शुद्ध नाम नही है।
इसका शुद्ध नाम *#नालंदा_महा_विहारिय_आर्य_भिक्खु_संघस्य* है।
अब भिक्खु संघ से जिसको दुश्मनी होगा, उसके महाविहार को वह खत्म कर दिया होगा!

आइए देखें-
इन दोनों कारण का हल नालंदा परिसर से प्राप्त सील से मिलेगा।
इस सील पर विद्यालय का नाम और आर्य कौन थे, लिखा है।
*#नालंदा_महा_विहारिय_आर्य_भिक्खु_संघस्य*


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