बच्चे बड़े हो रहे हैं, मैं busy 🎒
शाम को घर लौटकर door खोलता हूँ तो बच्चे दौड़कर सामने आ जाते हैं। कोई नई drawing दिखा रहा होता है, कोई excited होकर बताता है कि आज स्कूल में क्या हुआ, और उसी समय mind अभी भी office की last meeting और कल की deadline में फँसा होता है। एक हाथ से bag उतारता हूँ, दूसरे हाथ में phone पकड़ा रहता है, और "हाँ, अच्छा है" बोलकर आगे बढ़ जाता हूँ, जैसे यह सब बाद में properly देखने का time मिल जाएगा। 🎨
धीरे धीरे एक अजीब सा gap महसूस होने लगता है। हम खुद को समझाते हैं कि "मैं तो इन्हीं के future के लिए काम कर रहा हूँ", पर real time में उनकी life के छोटे moments हमारी आँखों के सामने से निकलते रहते हैं। school functions, छोटे jokes, आज किससे लड़ाई हुई, किससे दोस्ती हुई, यह सब सुनने की जगह हम अक्सर बस homework check करके tick लगा देते हैं। guilt भी आता है, पर mind खुद को same justification देता है कि अभी busy हूँ, बाद में catch up कर लूँगा, जबकि बचपन pause पर नहीं जाता।
⚖️ बच्चों के लिए काम करना important है, पर उनके बचपन में present रहना भी उतना ही जरूरी investment है।
आज एक छोटा सा step try कर सकते हो: रोज़ घर आने के बाद सिर्फ 15 मिनट का "no screen, सिर्फ बच्चों वाला time" fix कर लो, जिसमें phone किसी दूसरे room में हो और तुम बस उनसे तीन simple बातें पूछो - आज उन्हें किस बात पर हँसी आई, किस बात पर दुख हुआ और कल किस चीज़ का इंतज़ार है। यह छोटा सा daily check-in शायद EMI नहीं घटाएगा, लेकिन तुम्हें उनकी life का live हिस्सा बनाए रखेगा, सिर्फ distant provider नहीं।
— Sanjay · संतुलन 🧘
शाम को घर लौटकर door खोलता हूँ तो बच्चे दौड़कर सामने आ जाते हैं। कोई नई drawing दिखा रहा होता है, कोई excited होकर बताता है कि आज स्कूल में क्या हुआ, और उसी समय mind अभी भी office की last meeting और कल की deadline में फँसा होता है। एक हाथ से bag उतारता हूँ, दूसरे हाथ में phone पकड़ा रहता है, और "हाँ, अच्छा है" बोलकर आगे बढ़ जाता हूँ, जैसे यह सब बाद में properly देखने का time मिल जाएगा। 🎨
धीरे धीरे एक अजीब सा gap महसूस होने लगता है। हम खुद को समझाते हैं कि "मैं तो इन्हीं के future के लिए काम कर रहा हूँ", पर real time में उनकी life के छोटे moments हमारी आँखों के सामने से निकलते रहते हैं। school functions, छोटे jokes, आज किससे लड़ाई हुई, किससे दोस्ती हुई, यह सब सुनने की जगह हम अक्सर बस homework check करके tick लगा देते हैं। guilt भी आता है, पर mind खुद को same justification देता है कि अभी busy हूँ, बाद में catch up कर लूँगा, जबकि बचपन pause पर नहीं जाता।
⚖️ बच्चों के लिए काम करना important है, पर उनके बचपन में present रहना भी उतना ही जरूरी investment है।
आज एक छोटा सा step try कर सकते हो: रोज़ घर आने के बाद सिर्फ 15 मिनट का "no screen, सिर्फ बच्चों वाला time" fix कर लो, जिसमें phone किसी दूसरे room में हो और तुम बस उनसे तीन simple बातें पूछो - आज उन्हें किस बात पर हँसी आई, किस बात पर दुख हुआ और कल किस चीज़ का इंतज़ार है। यह छोटा सा daily check-in शायद EMI नहीं घटाएगा, लेकिन तुम्हें उनकी life का live हिस्सा बनाए रखेगा, सिर्फ distant provider नहीं।
— Sanjay · संतुलन 🧘