ऋषि चिंतन
।। आंतरिक विकारों के दुष्परिणाम ।।
🤜प्रायः जिस बात से शरीर में विकार तथा विविध व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं, उनका प्रधान कारण "शरीर का संचित मल" है।
हम अनाप-शनाप खाते हैं अप्राकृतिक भोजन प्रयोग में लाते हैं, घर और कल-कारखानों या ऑफिसों में बंद पड़े रहते हैं।
अतः शरीर और अंतड़ियों में दूषित द्रव्य या मल जमा हो जाता है।
यह संचित मल कुछ दिनों तक तो पड़ा रहता है, किंतु बाद में रक्त को दूषित बना देता है। पाचन प्रणाली दोषयुक्त हो जाती है, मल विसर्जन का कार्य करने वाले अवयव शिथिल हो जाते हैं, तब शरीर अंतर्बाह्य रोगी व दुर्बल बन जाता है।
ऐसी स्थिति में यह आवश्यक हो जाता है कि उदर को कुछ काल के लिए विश्रांति दी जाए।
🤜भोजन बंद कर देने से रक्त अस्वच्छ और विषाक्त नहीं होने पाता और अनेक रोग उत्पन्न होने की संभावना नहीं रहती।
हमारे शरीर के ज्ञानतंतुअ पर बहुत जोर नहीं पड़ता। अतः शरीर का बल बढ़ता है और ओज क्षीण नहीं होने पाता। बिना पचा हुआ जो भी अंश पेट में फालतू पड़ा रहता है, वह धीरे-धीरे पचता है, पेट की तोंद नहीं निकल पाती।
डॉ. लिंडहार लिख हैं- "उपवास में शरीर को, अंदर एकत्र भोजन का उपयोग शुरू करना होता है, किंतु इसके पूर्व शरीर की बहुत सी गंदगी और विष निकल जाते हैं। जब हम यह जान लेते हैं कि हमारी सारी की सारी पाचन प्रणाली, जो २६ फुट लंबी होती है और जिसका आरंभ मुख और अंत गुदा द्वार है, ऐसी सेलों और ग्रंथियों से सुसज्जित है, जिनका काम गंदगी निकालना है, तब लंबे उपवास का शोधक प्रभाव अच्छी तरह समझ में आ जाता है।"
🤜वास्तव में उपवास हमारे वर्षों के संचित मल को बाहर फेंककर नई जीवनशक्ति फूंक देता है, शरीर की गंदगी और विष उपवास काल में पिए गए जल द्वारा आसानी से निकलते रहते हैं।
अनेक रोगियों को उपवास इसी कारण कराया जाता है, जिससे आँतों की श्लैष्मिक कला को संचित मल की सफाई का अवसर प्राप्त हो सके। जो पूरी सफाई चाहते हैं, वे किसी "प्राकृतिक चिकित्सक" की देख-रेख में लंबा "उपवास" करते हैं।
यह संचित मल धीरे-धीरे निकलता है, पर सफाई होने के पश्चात कब्ज पूरी तरह चला जाता है।
।। आंतरिक विकारों के दुष्परिणाम ।।
🤜प्रायः जिस बात से शरीर में विकार तथा विविध व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं, उनका प्रधान कारण "शरीर का संचित मल" है।
हम अनाप-शनाप खाते हैं अप्राकृतिक भोजन प्रयोग में लाते हैं, घर और कल-कारखानों या ऑफिसों में बंद पड़े रहते हैं।
अतः शरीर और अंतड़ियों में दूषित द्रव्य या मल जमा हो जाता है।
यह संचित मल कुछ दिनों तक तो पड़ा रहता है, किंतु बाद में रक्त को दूषित बना देता है। पाचन प्रणाली दोषयुक्त हो जाती है, मल विसर्जन का कार्य करने वाले अवयव शिथिल हो जाते हैं, तब शरीर अंतर्बाह्य रोगी व दुर्बल बन जाता है।
ऐसी स्थिति में यह आवश्यक हो जाता है कि उदर को कुछ काल के लिए विश्रांति दी जाए।
🤜भोजन बंद कर देने से रक्त अस्वच्छ और विषाक्त नहीं होने पाता और अनेक रोग उत्पन्न होने की संभावना नहीं रहती।
हमारे शरीर के ज्ञानतंतुअ पर बहुत जोर नहीं पड़ता। अतः शरीर का बल बढ़ता है और ओज क्षीण नहीं होने पाता। बिना पचा हुआ जो भी अंश पेट में फालतू पड़ा रहता है, वह धीरे-धीरे पचता है, पेट की तोंद नहीं निकल पाती।
डॉ. लिंडहार लिख हैं- "उपवास में शरीर को, अंदर एकत्र भोजन का उपयोग शुरू करना होता है, किंतु इसके पूर्व शरीर की बहुत सी गंदगी और विष निकल जाते हैं। जब हम यह जान लेते हैं कि हमारी सारी की सारी पाचन प्रणाली, जो २६ फुट लंबी होती है और जिसका आरंभ मुख और अंत गुदा द्वार है, ऐसी सेलों और ग्रंथियों से सुसज्जित है, जिनका काम गंदगी निकालना है, तब लंबे उपवास का शोधक प्रभाव अच्छी तरह समझ में आ जाता है।"
🤜वास्तव में उपवास हमारे वर्षों के संचित मल को बाहर फेंककर नई जीवनशक्ति फूंक देता है, शरीर की गंदगी और विष उपवास काल में पिए गए जल द्वारा आसानी से निकलते रहते हैं।
अनेक रोगियों को उपवास इसी कारण कराया जाता है, जिससे आँतों की श्लैष्मिक कला को संचित मल की सफाई का अवसर प्राप्त हो सके। जो पूरी सफाई चाहते हैं, वे किसी "प्राकृतिक चिकित्सक" की देख-रेख में लंबा "उपवास" करते हैं।
यह संचित मल धीरे-धीरे निकलता है, पर सफाई होने के पश्चात कब्ज पूरी तरह चला जाता है।