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Good morning..🌴🌸🌻🌹

हर मुश्किल हमेशा एक नई सुंदरता को जन्म देती है,
तभी कहते हैं झरनों से इतना मधुर संगीत कभी सुनाई नहीं देता,
अगर उनकी राहों में पत्थर व चट्टानें न होती,
याद रहे हमारे आज के परिणाम हमेशा अतीत के कर्मो से तय होते है,
इसलिए भविष्य को बदलने के लिए पहले अपने आज के फैसलों को बदलें..❤️👍


प्रतिदिन खाएं चने

चना अपने पोषक तत्वों की वजह से सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होते हैं। इसमें भरपूर मात्रा में आयरन, सोडियम और सेलेनियम होता है। आप इसे भिगोकर और सब्जी बनाकर भी खा सकते हैं। अंकुरित चने विटामिन और बी कॉम्प्लेक्स का अच्छा स्रोत हैं। चने से आपको भरपूर ऊर्जा मिलती है और आपका पाचन तंत्र भी सही बना रहता है।



जोड़ों का दर्द

जोड़ों का दर्द - जोड़ों का दर्द कभी बढ़ती उम्र तो कभी अन्य कारणों से भी होता है। इसके लिए बथुए का रस बहुत कारगर उपाय है। बथुए के पत्तों का रस निकालकर लगभग 15 ग्राम रोजाना पीने से जोड़ों का दर्द दूर होता है। सुबह खालीपेट इसे पीना बहुत फायदेमंद होगा। अप चाहें तो शाम के समय भी इसका सेवन कर सकते हैं, लेकिन ध्यान रहे कि इसे खाली पेट ही पिएं और दो घंटे बाद तक कुछ भी न खाएं।


जड़ी-बूटियां और मसाले

तुलसी, अजवाइन के फूल, दालचीनी, पुदीना, जैसी जड़ी-बूटियां और मसाले न सिर्फ खाने को विशेष तरह का फ्लेवर और टेस्ट देते हैं, बल्कि इनके सेवन से कैल्शियम भी प्राप्त होता है।


ऑलिव ऑयल के फायदे

नहाने के बाद ऑलिव आयल लगाने से शरीर से काले धब्बे समाप्त हो जाते है और त्वचा भी दिनभर निखरी रहेगी।

चेहरे और गदर्न पर ऑलिव ऑयल लगाने से चेहरे पर रोनक और गर्दन का कालापन दूर होता है। इसका उपयोग काली त्वचा और काली कुहनियों कि समस्या को दूर करने के लिए किया जाता है। ऑलिव ऑयल नहाने के बाद 20  मिनट तक मसाज करने से स्किन कि टैनिग में आराम होता है। चंदन के पाउडर में ऑलिव ऑयलकि 2-3 बूँदे डालकर 10 मिनट तक चेहरे पर लगाकर रखे।
ऑलिव ऑयल से बेजान और रूखे होठ कोमल हो जाते हैं।


Sure_Ways_to_Self_Realization_Swami_Satyananda_Saraswati_.pdf
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ये bams का सिलेबस है
















ऋषि चिंतन

"उपवास" और मानसिक पवित्रता


👍स्वास्थ्य, आरोग्यता, दीर्घायु के अतिरिक्त आध्यात्मिक दृष्टि से "उपवास" का विशेष महत्त्व है।
शरीर की शुद्धि होने से मन पर भी प्रभाव पड़ता है। शरीर तथा मन दोनों में परस्पर घनिष्ठ संबंध है।

जब हमारा पेट भरा होता है, तो दृष्टि भी मैली हो जाती है, मन में कुविचार आते हैं, दुर्बल वासनाएँ उदीप्त हो उठती हैं, मानसिक विकारों में अभिवृद्धि होती है। राजसी भोजन से श्रृंगार रस की उत्पत्ति होती है और काम, क्रोध, रोगादि रिपु प्रबल हो उठते हैं। संपूर्ण पाप की जड़ अधिक भोजन, विशेष राजसी कामोत्तेजक भोजन करना है।

पेट का विवेक, शांति, धर्मबुद्धि इस तत्त्व को ध्यान में रख हमारे पुरुष अतीत काल से उपवास को मानसिक एवं आत्मिक स्वास्थ्य के लिए अपनाते रहे हैं।

इस प्रकार के उपवासों में ईसा, मुहम्मद, महावीर के लंबे उपवास सर्वविदित हैं। महात्मा गांधी के उपवास इसी कोटि में आते हैं। महात्माजी ने जितने भी उपवास किए, सभी लगभग नैतिक ध्येय से किए।

👍जब हमें भोजन, खान-पान से छुट्टी मिलती है और ये झंझट दूर हो जाते हैं, तब चित्तवृत्ति अच्छी तरह उच्च विषयों पर एकाग्र हो पाती है।

हमारी आंतरिक वृत्ति पवित्र एवं निर्दोष होती है। ब्रह्म में वृत्ति लीन करने के लिए "उपवास" सर्वोत्तम उपाय है। ऐसा प्रतीत होता है कि जिन व्यक्तियों ने ब्रह्मानंद का वर्णन किया है, वे अवश्य ही उपवासपरायण रहे होंगे। "उपवास" के समय "चिंतन" तथा "एकाग्रता" बड़ी उत्तमता से कार्य करते हैं। "उपवास" काल का ज्ञान अधिक स्थाई और स्पष्ट होता है। ज्ञान प्रायः भोजन के बोझ से दब जाता है, किंतु भोजन से मुक्ति मिलने पर स्पष्ट, निर्विकार और स्थायी बनता है। गीता में कहा है-
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः। रसवर्णं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥ - गीता २/५९

👍"उपवास" में बहुत सी नीच प्रवृत्तियाँ क्षीण हो जाती हैं; अंतर्दृष्टि पवित्र बनती है, वृत्तियाँ वश में रहती हैं, धर्मबुद्धि प्रबल बनती है, काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय और अहंकार आदि षड़रिपु क्षीण पड़ जाते हैं; प्राणशक्ति का प्रबल प्रवाह हमारे हृदय में बहने लगता है और शांत रस उत्पन्न होता है। उपवास से इंद्रियों का नर्तन, वृत्तियों का व्यर्थ इधर-उधर बहक जाना और एकाग्रता का अभाव दूर हो जाता है। ईश्वर-पूजन, साधना तथा योग के चमत्कारों के लिए "उपवास" एक अमोघ औषधि है।


ऋषि चिंतन

।। आंतरिक विकारों के दुष्परिणाम ।।

🤜प्रायः जिस बात से शरीर में विकार तथा विविध व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं, उनका प्रधान कारण "शरीर का संचित मल" है।

हम अनाप-शनाप खाते हैं अप्राकृतिक भोजन प्रयोग में लाते हैं, घर और कल-कारखानों या ऑफिसों में बंद पड़े रहते हैं।

अतः शरीर और अंतड़ियों में दूषित द्रव्य या मल जमा हो जाता है।

यह संचित मल कुछ दिनों तक तो पड़ा रहता है, किंतु बाद में रक्त को दूषित बना देता है। पाचन प्रणाली दोषयुक्त हो जाती है, मल विसर्जन का कार्य करने वाले अवयव शिथिल हो जाते हैं, तब शरीर अंतर्बाह्य रोगी व दुर्बल बन जाता है।

ऐसी स्थिति में यह आवश्यक हो जाता है कि उदर को कुछ काल के लिए विश्रांति दी जाए।

🤜भोजन बंद कर देने से रक्त अस्वच्छ और विषाक्त नहीं होने पाता और अनेक रोग उत्पन्न होने की संभावना नहीं रहती।

हमारे शरीर के ज्ञानतंतुअ पर बहुत जोर नहीं पड़ता। अतः शरीर का बल बढ़ता है और ओज क्षीण नहीं होने पाता। बिना पचा हुआ जो भी अंश पेट में फालतू पड़ा रहता है, वह धीरे-धीरे पचता है, पेट की तोंद नहीं निकल पाती।

डॉ. लिंडहार लिख हैं- "उपवास में शरीर को, अंदर एकत्र भोजन का उपयोग शुरू करना होता है, किंतु इसके पूर्व शरीर की बहुत सी गंदगी और विष निकल जाते हैं। जब हम यह जान लेते हैं कि हमारी सारी की सारी पाचन प्रणाली, जो २६ फुट लंबी होती है और जिसका आरंभ मुख और अंत गुदा द्वार है, ऐसी सेलों और ग्रंथियों से सुसज्जित है, जिनका काम गंदगी निकालना है, तब लंबे उपवास का शोधक प्रभाव अच्छी तरह समझ में आ जाता है।"

🤜वास्तव में उपवास हमारे वर्षों के संचित मल को बाहर फेंककर नई जीवनशक्ति फूंक देता है, शरीर की गंदगी और विष उपवास काल में पिए गए जल द्वारा आसानी से निकलते रहते हैं।

अनेक रोगियों को उपवास इसी कारण कराया जाता है, जिससे आँतों की श्लैष्मिक कला को संचित मल की सफाई का अवसर प्राप्त हो सके। जो पूरी सफाई चाहते हैं, वे किसी "प्राकृतिक चिकित्सक" की देख-रेख में लंबा "उपवास" करते हैं।

यह संचित मल धीरे-धीरे निकलता है, पर सफाई होने के पश्चात कब्ज पूरी तरह चला जाता है।


उपनिषद_वचनामृत_दीनानाथ_सिद्धान्तालंकार.pdf
15.4Мб
उपनिषद वचनामृत
दीनानाथ सिद्धान्तालंकार


आवश्यकता से अधिक सोचना व्यर्थ समय ही बर्बाद करना है।
क्योंकि, जो बीत गया है उसे बदला नहीं जा सकता और भविष्य की होने वाली घटनाओं का वर्तमान में भय करने का कोई अर्थ नहीं है। इनमे से अधिकांश घटनाएँ तो घटित भी नहीं होती।


प्रशंसा और आलोचना दोनों से ऊपर उठना ही आंतरिक स्थिरता की निशानी है। सबको उत्तर देने में अपनी ऊर्जा नष्ट न करें। जब आप स्वयं को पहचान लेंगे, तब संतुलन अपने आप आ जाएगा। 🪕⚖️🙏


VedSiddhantNirnay.pdf
31.5Мб
वेदसिद्धांतनिर्णय




🇮🇳 80वें स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ 🇮🇳

स्वतंत्रता हमें विरासत में मिली है,
लेकिन विकसित भारत हमें मिलकर बनाना है।

"तिरंगा केवल हमारी पहचान नहीं,
हमारी जिम्मेदारी भी है।"

आज संकल्प लें कि हम अपने ज्ञान, मेहनत और अनुशासन से देश को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने में योगदान देंगे।

📚 पढ़ेंगे भी,
🎯 सफल भी होंगे,
🇮🇳 और भारत का नाम भी रोशन करेंगे।

आप सभी विद्यार्थियों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

जय हिन्द 🇮🇳
वन्दे मातरम् 🇮🇳


Twenty_Five_Doors_to_Meditation_Handbook_for_Entering_Samadhi.pdf
2.2Мб
Twenty-Five Doors to Meditation Handbook for Entering Samadhi

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