ऋषि चिंतन
"उपवास" और मानसिक पवित्रता
👍स्वास्थ्य, आरोग्यता, दीर्घायु के अतिरिक्त आध्यात्मिक दृष्टि से "उपवास" का विशेष महत्त्व है।
शरीर की शुद्धि होने से मन पर भी प्रभाव पड़ता है। शरीर तथा मन दोनों में परस्पर घनिष्ठ संबंध है।
जब हमारा पेट भरा होता है, तो दृष्टि भी मैली हो जाती है, मन में कुविचार आते हैं, दुर्बल वासनाएँ उदीप्त हो उठती हैं, मानसिक विकारों में अभिवृद्धि होती है। राजसी भोजन से श्रृंगार रस की उत्पत्ति होती है और काम, क्रोध, रोगादि रिपु प्रबल हो उठते हैं। संपूर्ण पाप की जड़ अधिक भोजन, विशेष राजसी कामोत्तेजक भोजन करना है।
पेट का विवेक, शांति, धर्मबुद्धि इस तत्त्व को ध्यान में रख हमारे पुरुष अतीत काल से उपवास को मानसिक एवं आत्मिक स्वास्थ्य के लिए अपनाते रहे हैं।
इस प्रकार के उपवासों में ईसा, मुहम्मद, महावीर के लंबे उपवास सर्वविदित हैं। महात्मा गांधी के उपवास इसी कोटि में आते हैं। महात्माजी ने जितने भी उपवास किए, सभी लगभग नैतिक ध्येय से किए।
👍जब हमें भोजन, खान-पान से छुट्टी मिलती है और ये झंझट दूर हो जाते हैं, तब चित्तवृत्ति अच्छी तरह उच्च विषयों पर एकाग्र हो पाती है।
हमारी आंतरिक वृत्ति पवित्र एवं निर्दोष होती है। ब्रह्म में वृत्ति लीन करने के लिए "उपवास" सर्वोत्तम उपाय है। ऐसा प्रतीत होता है कि जिन व्यक्तियों ने ब्रह्मानंद का वर्णन किया है, वे अवश्य ही उपवासपरायण रहे होंगे। "उपवास" के समय "चिंतन" तथा "एकाग्रता" बड़ी उत्तमता से कार्य करते हैं। "उपवास" काल का ज्ञान अधिक स्थाई और स्पष्ट होता है। ज्ञान प्रायः भोजन के बोझ से दब जाता है, किंतु भोजन से मुक्ति मिलने पर स्पष्ट, निर्विकार और स्थायी बनता है। गीता में कहा है-
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः। रसवर्णं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥ - गीता २/५९
👍"उपवास" में बहुत सी नीच प्रवृत्तियाँ क्षीण हो जाती हैं; अंतर्दृष्टि पवित्र बनती है, वृत्तियाँ वश में रहती हैं, धर्मबुद्धि प्रबल बनती है, काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय और अहंकार आदि षड़रिपु क्षीण पड़ जाते हैं; प्राणशक्ति का प्रबल प्रवाह हमारे हृदय में बहने लगता है और शांत रस उत्पन्न होता है। उपवास से इंद्रियों का नर्तन, वृत्तियों का व्यर्थ इधर-उधर बहक जाना और एकाग्रता का अभाव दूर हो जाता है। ईश्वर-पूजन, साधना तथा योग के चमत्कारों के लिए "उपवास" एक अमोघ औषधि है।