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💠 प्रेरणाप्रद कहानी

शीर्षक:-
बेटी, भाभी और ननद – रिश्तों की सच्चाई

कहानी:- अक्सर बहुएँ शिकायत करती हैं कि ससुराल में उन्हें बेटी की तरह नहीं समझा जाता। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि मायके में बेटी होने का मतलब क्या था? जब आप मायके में थीं, तब देर तक सोना, आराम से उठना, चाय-नाश्ता तैयार मिलना और घर के कामों की जिम्मेदारी माँ और मेड पर छोड़ देना आम बात थी। कभी-कभी मदद कर देना अलग बात है, लेकिन असल में आपकी कोई जिम्मेदारी नहीं थी।

अब सोचिए, अगर आपकी माँ ने भी शादी के बाद यही सोचा होता कि वह ससुराल में बेटी की तरह रहेंगी, तो क्या आपको यह सुविधा मिल पाती? माँ ने अपने कर्तव्यों को समझा और उन्हें निभाया, तभी आपको आराम और सुरक्षा मिली। जब शादी के बाद आप पर भी जिम्मेदारी आती है, तो फिर घबराना क्यों? ससुराल में बहू बनकर रहना एक नई जिम्मेदारी है, जिसमें अपनापन खुद पैदा करना होता है।

जब आप मायके जाती हैं और आपकी भाभी देर तक सोती हैं, तब क्या आपको अच्छा लगता है कि आपकी माँ अकेले रसोई में काम करें? शायद नहीं। आप जरूर कहेंगी कि भाभी को भी मदद करनी चाहिए। लेकिन जब यही स्थिति आपकी ससुराल में होती है, तो आपको यह कठोर क्यों लगता है?

अब एक और परिस्थिति पर विचार करें। अगर आपकी भाभी सिर्फ अपने पति, बच्चों और सास-ससुर का ख्याल रखे, लेकिन देवर, ननद या अन्य सदस्यों से कोई मतलब न रखे, तो क्या आपको यह अच्छा लगेगा? यदि आपके भाई की शादी पहले हो गई और आपकी भाभी यह कहे कि वह आपके लिए खाना नहीं बनाएंगी, तो क्या आपके माता-पिता को यह स्वीकार होगा? शायद नहीं। हर घर का संतुलन आपसी समझ और सहयोग से चलता है, केवल अधिकारों की माँग से नहीं।

जब आप ससुराल में यह सोचती हैं कि ननद और उनके बच्चों का आना आपको कष्ट देता है, तो यह भी सोचिए कि आपकी भाभी के लिए भी आपका मायके आना वैसा ही हो सकता है। यदि आप चाहती हैं कि आपकी भाभी आपको अपनाए, तो आपको भी उसे वही अपनापन देना होगा। रिश्ते समझ और समर्पण से चलते हैं। जब तक आप खुद पहल नहीं करेंगी, तब तक आप दूसरों से अपनापन कैसे उम्मीद कर सकती हैं?

क्या आपने कभी अपनी माँ को मायके में वैसे ही महसूस करवाया, जैसा आप चाहती हैं कि ससुराल में आपको महसूस कराया जाए? शायद नहीं। फिर यह उम्मीद क्यों कि आपको बेटी जैसा रखा जाए?

माँ ने कभी शिकायत नहीं की कि उन्हें जल्दी उठना पड़ता था, घर संभालना पड़ता था। यहाँ तक कि जब वह बीमार भी होती थीं, तब भी आपके लिए खाना बनाती थीं। उनकी यही भावना थी, जिसने परिवार को जोड़े रखा। यही त्याग और समर्पण एक महिला को महान बनाता है।

जब एक लड़की शादी के बाद ससुराल जाती है, तो वह वहाँ की जिम्मेदारियों का हिस्सा बन जाती है। जिस तरह मायके में माँ और भाभी घर संभालती हैं, वैसे ही ससुराल में भी उसे जिम्मेदारियों को अपनाना चाहिए। मायके और ससुराल दोनों के रिश्ते प्रेम और सम्मान पर टिके होते हैं।

शिकायतों की बजाय यदि हम अपने व्यवहार में सकारात्मक बदलाव लाएँ, तो रिश्ते और भी मजबूत हो सकते हैं। परिवार केवल अधिकारों से नहीं, बल्कि कर्तव्यों को निभाने से चलता है। जब आप अपने कर्तव्यों को समझकर निभाएँगी, तभी आपको भी वही सम्मान और अपनापन मिलेगा।

सीख:- रिश्ते अधिकारों से नहीं, बल्कि कर्तव्यों और प्रेम से चलते हैं। मायके और ससुराल दोनों का सम्मान करें। जो महिलाएँ इस संतुलन को समझती हैं, वे ही सच्चे मायनों में सराहना की पात्र होती हैं। जब हम अपने कर्तव्यों को पूरी ईमानदारी से निभाते हैं, तभी हमें सच्चा अपनापन मिलता है।

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💠 प्रेरणाप्रद कहानी

शीर्षक:-
परमात्मा से शिकायत क्यों?

कहानी:- एक समय की बात है, किसी राज्य में एक प्रतापी राजा शासन करता था। वह जितना वीर और बुद्धिमान था, उतना ही अपने सेवकों के प्रति उदार और प्रेमपूर्ण। किंतु उसके दरबार में एक सेवक ऐसा था जो राजा के हृदय के अत्यंत समीप था। यह सेवक केवल निष्ठावान ही नहीं, अपितु राजा का परम भक्त भी था। राजा भी उस पर अपार स्नेह रखता था और उसे अपने सबसे प्रिय व्यक्ति के रूप में मानता था।

यह राजा का ही स्नेह था कि वह सेवक अन्य नौकरों की भांति अलग नहीं रहता था, बल्कि राजमहल के भीतर, स्वयं राजा के कक्ष में उसके साथ ही सोता था। राजा को उस पर इतना भरोसा था कि वह अपना हर कार्य पहले उसे सौंपता, अपनी हर बात उससे साझा करता।

एक दिन राजा अपने प्रिय सेवक के साथ शिकार पर गया। दिनभर वन में घूमते रहे, किंतु कोई बड़ा शिकार हाथ न लगा। दोपहर होते-होते वे घने जंगल में काफी भीतर चले गए और दिशा भूल गए। दोनों को तीव्र भूख लगने लगी, परंतु आसपास भोजन का कोई साधन न था।

तभी राजा की दृष्टि एक वृक्ष पर पड़ी, जिसके हरे-भरे पत्तों के बीच कुछ अपरिचित फल लगे थे। राजा ने एक फल तोड़ा, पर उसे पहचान न सका। फिर भी उसने अपनी आदत के अनुसार अपनी कटार निकाली, फल को बीच से चीरकर पहला टुकड़ा अपने सेवक को दिया। यह उसका नियम था—कोई भी चीज खाने से पहले वह अपने सेवक को परोसता था।

सेवक ने फल का टुकड़ा लिया, एक क्षण राजा की ओर देखा और बिना किसी झिझक के उसे अपने मुंह में रख लिया। जैसे ही वह स्वाद उसके जिह्वा से टकराया, उसकी आँखों में प्रसन्नता की एक अनोखी चमक दौड़ गई।

"मालिक! यह कितना मधुर है! कृपया मुझे एक और टुकड़ा दें!" सेवक ने आग्रह किया।

राजा ने प्रसन्नतापूर्वक दूसरा टुकड़ा दे दिया।

"मालिक! एक और..."

राजा मुस्कुराया और तीसरा टुकड़ा भी उसे दे दिया।

परंतु जैसे ही वह अंतिम टुकड़ा लेने लगा, राजा के मन में जिज्ञासा उठी। सेवक ने पहले कभी इस प्रकार किसी चीज के लिए आग्रह नहीं किया था। इस फल में ऐसा क्या विशेष था?

"बस, अब यह टुकड़ा मैं खुद चखूँगा।" राजा ने फल का अंतिम टुकड़ा अपने लिए रख लिया।

परंतु सेवक अचानक व्याकुल हो उठा।

"नहीं, मालिक! कृपया यह टुकड़ा मुझे दे दें!"

राजा ने उसकी यह अधीरता देखी और मन ही मन चकित हुआ। ऐसा तो कभी नहीं हुआ था! उसने संदेहवश टुकड़े को और दृढ़ता से पकड़ लिया।

अब दोनों के बीच छीना-झपटी होने लगी। सेवक ने भरसक प्रयास किया कि राजा उस टुकड़े को न खाए। किंतु राजा भी अपनी जिज्ञासा को रोक नहीं सका और उसने वह टुकड़ा अपने मुंह में रख लिया।

जैसे ही फल की गंध और स्वाद उसके जिह्वा पर पड़ा, उसके चेहरे का रंग बदल गया। यह तो अत्यंत कटु और विषैला था! इतनी कड़वाहट उसने अपने जीवन में कभी अनुभव नहीं की थी। उसने तुरंत फल को थूका और क्रोध से सेवक की ओर देखा।

"पागल! यह तो जहर था! तूने मुझे बताया क्यों नहीं?"

सेवक की आँखें प्रेम से भरी थीं। वह सिर झुकाकर बोला,

"मालिक! जब तक आपके हाथों से अनगिनत मधुर फल मिले, तब तक मैंने हर बार हर्षपूर्वक उन्हें स्वीकार किया। तो फिर एक कड़वे फल की क्या शिकायत करूँ?"

राजा स्तब्ध रह गया। यह उत्तर उसकी आत्मा को झकझोरने वाला था। उसकी आँखों में अश्रु उमड़ पड़े। इस सेवक ने उसे एक ऐसा पाठ पढ़ा दिया था, जिसे वह अपने जीवन में कभी नहीं भूल सकता था।

शिक्षा:- जीवन में हम परमात्मा से अनगिनत सुख प्राप्त करते हैं—स्वास्थ्य, परिवार, प्रेम, सफलता, आनंद। परंतु जैसे ही हमें कोई दुख मिलता है, हम तुरंत शिकायत करने लगते हैं। यदि हमने उन सुखद पलों में धन्यवाद देना सीखा, तो क्या हमें कठिनाइयों में भी धैर्य नहीं रखना चाहिए?

शिकायत हमें परमात्मा से दूर ले जाती है, जबकि कृतज्ञता हमें और समीप लाती है।

जो जीवन के मधुर फलों को प्रेमपूर्वक स्वीकार करता है, उसे कटुता भी सहजता से अपनाने की शक्ति मिलती है। और यही भाव एक दिन उसे पूर्णता की ओर ले जाता है—जहाँ केवल प्रेम, शांति और दिव्यता का साम्राज्य होता है।

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इसके पश्चात, उन्होंने दूसरे पुतले की ओर संकेत करते हुए कहा—

"यह वह व्यक्ति है, जो कुछ भी सुनता है, किंतु न तो उस पर ध्यान देता है और न ही उसे दूसरों को बताने में रुचि रखता है। वह अपने ही संसार में मग्न रहता है। ऐसे व्यक्ति किसी को कोई हानि नहीं पहुँचाते, परंतु किसी विशेष योगदान के अभाव में उनकी कीमत सीमित रहती है। अतः इसका मूल्य एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ है।"

अंत में, उन्होंने तीसरे पुतले की ओर दृष्टि घुमाई और बोले—

"यह तीसरा पुतला उन लोगों का प्रतीक है जो किसी भी बात को बिना सोचे-समझे तुरंत दूसरों को बता देते हैं। वे कान के कच्चे और मुँह के हल्के होते हैं। बिना सत्यापन के किसी भी सूचना को फैलाने वाले लोग समाज में भ्रम और अशांति उत्पन्न कर सकते हैं। इसलिए, इस पुतले का मूल्य केवल एक मुद्रा है।"

सम्राट चंद्रगुप्त ने गहरे चिंतन के साथ चाणक्य के शब्दों को आत्मसात किया। दरबार में बैठे सभी व्यक्तियों ने भी इस कथा से एक महत्वपूर्ण शिक्षा प्राप्त की।

शिक्षा:- मनुष्य को सदैव विवेकपूर्ण ढंग से व्यवहार करना चाहिए। सुनी-सुनाई बातों पर आँख मूँदकर विश्वास नहीं करना चाहिए, अपितु पहले तथ्यों की पुष्टि करनी चाहिए। ज्ञानवान व्यक्ति वही होता है, जो अपने शब्दों का चयन सोच-समझकर करता है।

आज के युग में भी यह शिक्षा अत्यंत प्रासंगिक है। जब सूचना तेजी से फैलती है, तब हमें यह निर्णय लेना चाहिए कि हम कौन-से पुतले की तरह बनना चाहते हैं—

▪️ वह जो सोच-समझकर बोलता है और समाज में आदर प्राप्त करता है?
▪️ वह जो अनसुना कर देता है, किंतु किसी को हानि नहीं पहुँचाता?
▪️ या वह, जो बिना सोचे-समझे कुछ भी कहकर समस्याएँ उत्पन्न करता है?

निर्णय आपका है!

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💠 प्रेरणाप्रद कहानी

शीर्षक:- तीन पुतले

कहानी:- मगध सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य का दरबार अपने भव्य स्वरूप में सजा हुआ था। स्वर्णिम छतरी के नीचे चमकते सिंहासन पर सम्राट विराजमान थे, और उनके चारों ओर विद्वानों, मंत्रियों तथा सेनापतियों की सभा आसीन थी। महामंत्री आचार्य चाणक्य अपने गहन ज्ञान और सूझबूझ से दरबार की कार्यवाही संचालित कर रहे थे।

चंद्रगुप्त को विलक्षण और अनोखी वस्तुओं का बड़ा शौक था, विशेषकर खिलौनों में उनकी रुचि असाधारण थी। प्रतिदिन वह कोई न कोई नया खिलौना देखने की इच्छा रखते थे। आज भी, जैसे ही उन्होंने उत्सुकतावश पूछा—

"आज हमारे लिए क्या नवीन उपहार आया है?"

एक दरबारी ने तुरंत सूचना दी—

"महाराज! एक दूरदेशीय सौदागर दरबार की दहलीज़ पर खड़ा है। वह दावा करता है कि उसने ऐसे अनूठे पुतले बनाए हैं, जिन्हें न तो आपने पहले कभी देखा होगा और न ही भविष्य में देखने को मिलेंगे।"

चंद्रगुप्त की जिज्ञासा प्रज्वलित हो उठी। उन्होंने सौदागर को दरबार में बुलाने का आदेश दिया।

कुछ ही क्षणों में, एक कुटिल मुस्कान लिए सौदागर राजदरबार में प्रविष्ट हुआ। उसने विनम्रतापूर्वक प्रणाम किया और अपनी झोली में से तीन सुंदर, सजीव-से प्रतीत होते पुतले बाहर निकाले। उन पुतलों की कारीगरी इतनी उत्कृष्ट थी कि उन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता मानो वे किसी क्षण बोल उठेंगे।

सौदागर ने पुतलों को राजा के समक्ष रखते हुए कहा—

"महाराज, ये तीनों पुतले अद्वितीय हैं। देखने में एक जैसे हैं, किंतु इनके गुण भिन्न-भिन्न हैं। पहला पुतला एक लाख स्वर्ण मुद्राओं का है, दूसरा मात्र एक हजार मुद्राओं का, और तीसरे की कीमत केवल एक मुद्रा है।"

यह सुनकर सम्राट चकित रह गए। उन्होंने पुतलों को हर ओर से देखा, परंतु उनमें कोई विशेष अंतर नहीं दिखाई दिया।

"इनमें इतना मूल्य अंतर क्यों?"— चंद्रगुप्त ने विस्मयपूर्वक पूछा।

मगर कोई उत्तर नहीं मिला। सभा में सन्नाटा छा गया। हर कोई पुतलों को उलट-पलट कर देखने लगा, परन्तु भेद कोई न पा सका। हारकर सम्राट ने महामंत्री चाणक्य की ओर देखा और कहा—

"गुरुदेव, आपके समक्ष कोई भी रहस्य अधिक देर तक छिपा नहीं रह सकता। कृपया इस गूढ़ पहेली को सुलझाने का कष्ट करें।"

चाणक्य मंद मुस्कुराए। उन्होंने पुतलों को ध्यानपूर्वक देखा और एक प्रहरी को आदेश दिया—

"तिनके ले आओ।"

सभी अचंभित थे। आखिर पुतलों का रहस्य तिनकों से कैसे खुलेगा?

कुछ ही क्षणों में, सैनिक तिनके ले आया। चाणक्य ने पहला तिनका उठाया और उसे पहले पुतले के कान में डाला। सभा में उपस्थित जन विस्मय से देखते रहे— तिनका सीधा पुतले के पेट में चला गया। कुछ क्षणों बाद पुतले के होंठ हिले, मानो वह कुछ कहने वाला हो, परंतु उसने कुछ नहीं कहा।

इसके बाद, आचार्य ने दूसरा तिनका दूसरे पुतले के कान में डाला। इस बार, सभी ने देखा कि तिनका दूसरे कान से बाहर निकल गया। किंतु पुतला वैसा ही स्थिर बना रहा।

अब चाणक्य ने तीसरे पुतले की बारी ली। जैसे ही तिनका उसके कान में डाला, वह सीधे पुतले के मुँह से बाहर निकल आया। और तब— पुतले का मुख खुल गया, मानो वह ऊँचे स्वर में कुछ चिल्ला रहा हो।

दरबार में हलचल मच गई। चंद्रगुप्त ने उत्सुकतावश पूछा—

"गुरुदेव! यह क्या रहस्य है? इन पुतलों का मूल्य इतना भिन्न क्यों है?"

चाणक्य गंभीरता से बोले—

"राजन! ये तीन पुतले मनुष्यों के स्वभाव के तीन भिन्न प्रकारों का प्रतिनिधित्व करते हैं।"

फिर उन्होंने प्रथम पुतले की ओर इशारा कर कहा—

"यह वह व्यक्ति है जो सुनी-सुनाई बातों को अपने हृदय में संजोकर रखता है। वह पहले विचार करता है, फिर अपनी वाणी खोलता है। यह एक ज्ञानी और विवेकी पुरुष का प्रतीक है। ऐसा व्यक्ति अपने ज्ञान की गंभीरता और बुद्धिमत्ता के कारण अत्यधिक मूल्यवान होता है। इसी कारण, इस पुतले का मूल्य एक लाख स्वर्ण मुद्राएँ है।"

क्रमश जारी..




📜 प्रेरणाप्रद कहानी

शीर्षक:-
अहंकार

कहानी:- शादी को अभी एक वर्ष भी पूरा नहीं हुआ था कि सुधा और मोहन के बीच किसी छोटी-सी बात पर विवाद हो गया। दोनों ही शिक्षित थे, अपनी-अपनी नौकरियों में व्यस्त और स्वाभिमान से परिपूर्ण। जरा-सी अनबन हुई और दोनों के बीच बातचीत पूरी तरह बंद हो गई। किसी ने पहल नहीं की, क्योंकि दोनों के मन में एक ही सवाल था—"पहले मैं क्यों झुकूं? मैं क्यों माफी मांगूं।"

तीन दिन बीत गए, पर मौन की दीवार जस की तस खड़ी रही। इस बीच, न जाने कितनी बार दोनों ने चाहा कि एक-दूसरे से बात कर लें, परंतु अपने-अपने अहंकार के कारण रुक गए।

सुधा ने सुबह के नाश्ते में पोहे बनाए, लेकिन गलती से उसमें मिर्च अधिक डाल दी। उसने स्वाद नहीं चखा, इसलिए गलती का आभास भी नहीं हुआ। मोहन ने भी गुस्से में चुपचाप तीखा नाश्ता खा लिया, बिना एक शब्द बोले। मिर्च इतनी ज्यादा थी कि ठंड के मौसम में भी वह पसीने से तर हो गया, पर उसने सुधा को कुछ भी नहीं बताया। जब बाद में सुधा ने पोहे खाए, तब उसे अपनी भूल समझ आई।

एक पल को मन में आया कि मोहन से क्षमा मांग ले, पर तभी उसे अपनी सहेली की सीख याद आ गई—"अगर तुम झुकीं, तो हमेशा तुम्हें ही झुकना पड़ेगा।" यह सोचकर वह चुप रह गई, हालांकि मन ही मन अपराधबोध से भर गई।

अगले दिन रविवार था। मोहन की नींद देर से खुली। घड़ी देखी तो नौ बज चुके थे। उसने सुधा की ओर देखा—वह अभी तक सो रही थी। यह देखकर वह चौंका, क्योंकि सुधा तो रोज़ जल्दी उठकर योग करती थी। उसने सोचा, "शायद नाराजगी के कारण लेटी होगी।"

मोहन खुद उठकर नींबू पानी बनाने चला गया। अख़बार लेकर बैठा, पर सुधा को अब भी सोता देख उसका ध्यान भटक गया। दस बज गए थे, लेकिन सुधा अब भी नहीं उठी। कुछ हिचकते हुए वह उसके पास गया और धीरे से बोला—"सुधा... दस बज गए हैं, अब तो उठो।"

कोई उत्तर नहीं मिला। उसने दो-तीन बार पुकारा, पर सुधा ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। अब उसका मन बेचैन हो उठा। उसने घबराकर कंबल हटाया और सुधा के गालों को छूकर देखा—उसका शरीर तप रहा था!

वह घबराकर रसोई में गया और अदरक की चाय बनाई। जल्दी से वापस आकर उसने सुधा को सहारा देकर उठाया और पीठ के पीछे तकिया लगा दिया।

"कोई दिक्कत तो नहीं कप पकड़ने में? क्या मैं तुम्हें पिला दूं?" मोहन की आवाज़ में चिंता और स्नेह का अद्भुत मिश्रण था।

सुधा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, "नहीं, मैं पी लूंगी।"

मोहन भी वहीं बैठकर चाय पीने लगा। उसके चेहरे पर चिंता स्पष्ट झलक रही थी।

"इसके बाद तुम आराम करो, मैं तुम्हारे लिए दवा लेकर आता हूं।"

सुधा चाय पीते-पीते मोहन को देखती रही। उसे याद आया कि कुछ देर पहले वह मायके जाने का निर्णय ले रही थी, और अब वही मोहन, जिससे वह तीन दिनों से बात भी नहीं कर रही थी, उसकी इतनी परवाह कर रहा था।

"मोहन..." सुधा ने धीमे स्वर में कहा।

"हाँ, क्या हुआ? सिर में बहुत दर्द हो रहा है क्या? आओ, मैं सहला दूं..." मोहन ने तुरंत पूछा।

"नहीं, मैं ठीक हूँ... बस एक बात पूछनी थी।"

"पूछो।"

"इतने दिनों से मैं तुमसे बात भी नहीं कर रही थी, और उस दिन नाश्ते में मिर्च भी ज़्यादा थी। तुम परेशान हुए, फिर भी मेरी इतनी देखभाल कर रहे हो... क्यों?"

मोहन ने गहरी सांस ली और मुस्कुराकर कहा, "परेशान तो मैं बहुत हूँ, क्योंकि तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है। रही हमारे झगड़े की बात, तो जब जीवनभर साथ रहना ही है, तो कभी-कभी मतभेद भी होंगे, रूठना-मनाना भी होगा। दो बर्तन साथ होंगे तो खटपट तो होगी ही... समझीं मेरी जीवनसंगिनी?"

सुधा ने हल्की हँसी के साथ सिर हिलाया और मोहन के गले लग गई। मन ही मन उसने अपने आपसे वादा किया—"अब कभी अपने और मोहन के बीच अहंकार को आने नहीं दूंगी।"

शिक्षा:- इस कथा से हमें यह महत्वपूर्ण सीख मिलती है कि अहंकार (ईगो) रिश्तों को खोखला कर देता है। स्नेह, समझ और संवाद ही किसी संबंध की नींव को सुदृढ़ बनाते हैं। किसी भी रिश्ते में झुकना कमजोरी नहीं, बल्कि परिपक्वता की निशानी है। जीवनभर साथ रहने के लिए अहंकार को छोड़कर प्रेम को अपनाना ही सच्चा सुख है।


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📜 प्रेरणाप्रद कहानी

शीर्षक:-
सच्चाई की जीत

कहानी:- मायापुर नाम का एक सुंदर गाँव था, जिसके किनारे एक घना जंगल फैला हुआ था। जंगल में तरह-तरह के पशु-पक्षी रहते थे, और अक्सर लोग लकड़ियाँ काटने वहाँ जाया करते थे। उन्हीं में से एक था रामदीन, जो ईमानदार और परिश्रमी लकड़हारा था। एक दिन जब वह जंगल से लकड़ियाँ लेकर अपने गाँव लौट रहा था, तभी अचानक सामने से एक विशाल शेर आ गया। शेर की आँखों में भयंकर भूख झलक रही थी। वह गरजते हुए बोला, "आज सुबह से मुझे कोई शिकार नहीं मिला है। मैं बहुत भूखा हूँ और अब तुम्हें ही खाकर अपनी भूख मिटाऊँगा!"

रामदीन का दिल तेजी से धड़कने लगा, परंतु उसने हिम्मत जुटाकर कहा, "मुझे मारकर अगर तुम्हारी भूख मिटती है, तो यह मेरा सौभाग्य होगा। परंतु मेरी एक विनती सुन लो। मेरे घर पर मेरी पत्नी और छोटे-छोटे बच्चे भूखे मेरा इंतजार कर रहे हैं। मैं यह लकड़ियाँ बेचकर उनके लिए भोजन ले जाऊँगा और उन्हें खिलाने के बाद तुम्हारे पास लौट आऊँगा। मैं अपना वचन नहीं तोडूँगा।" शेर ने ठहाका लगाते हुए कहा, "मैं मूर्ख नहीं हूँ कि तुम्हारी बातों में आ जाऊँ। एक बार गए तो फिर लौटकर कभी नहीं आओगे।" रामदीन की आँखों में आँसू आ गए। उसने करुणा भरी आवाज़ में कहा, "मैं झूठ नहीं बोलता। ईश्वर साक्षी है, मैं अपना वादा पूरा करूँगा।" शेर को उसकी सच्चाई पर भरोसा हो गया और उसने सूर्यास्त तक लौटने की अनुमति दे दी।

रामदीन गाँव पहुँचा और जल्दी-जल्दी लकड़ियाँ बेचकर घर के लिए भोजन लेकर गया। पत्नी ने जब उसे जल्दी करते देखा तो कारण पूछा। रामदीन ने पूरी बात बताई तो घरवाले रोने लगे और उसे रोकने की कोशिश की, लेकिन उसने कहा, "एक बार जो वचन दे दिया, उसे निभाना ही होगा। सत्य से बढ़कर कुछ भी नहीं।" वह परिवार को खाना देकर, अपने बच्चों को गले लगाकर, फिर से जंगल की ओर चल पड़ा। रास्ते में उसे कई लोगों ने रोका, पर वह अपने संकल्प पर अडिग रहा।

शेर ने सोचा था कि लकड़हारा डरकर नहीं आएगा, लेकिन जब उसने रामदीन को सचमुच वापस आते देखा, तो वह हैरान रह गया। उसकी आँखों में सम्मान झलकने लगा। उसने गर्व से कहा, "तुम जैसे सच्चे और ईमानदार मनुष्य कम ही होते हैं। तुम्हें मारकर मैं पाप नहीं करना चाहता। जाओ, अपनी सच्चाई और नेकदिली से हमेशा लोगों का दिल जीतते रहो।" रामदीन ने शेर का धन्यवाद किया और प्रसन्न मन से अपने घर लौट गया।

शिक्षा:- हमें जीवन में हमेशा सच्चाई और ईमानदारी का पालन करना चाहिए। सत्य की राह कठिन हो सकती है, लेकिन अंत में वही जीतता है। जब इंसान अपने वचन और कर्तव्य के प्रति निष्ठावान रहता है, तो स्वयं प्रकृति भी उसका साथ देती है।

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📜 प्रेरणाप्रद कहानी

शीर्षक:-
धैर्य और आत्म-मूल्य

कहानी:- एक बार एक व्यक्ति अकेला, उदास बैठा अपने जीवन की असफलताओं के बारे में सोच रहा था। वह पूरी तरह निराश हो चुका था और उसे अपनी ज़िंदगी व्यर्थ लगने लगी थी। तभी अचानक भगवान उसके समक्ष प्रकट हुए। भगवान को देखकर व्यक्ति की आँखों में आशा की एक किरण जागी। उसने भगवान से पूछा, "हे प्रभु, मुझे जीवन में बार-बार असफलता ही मिली है। मैं समझ नहीं पा रहा कि मेरी कोई कीमत भी है या नहीं। कृपया मुझे बताइए कि मेरे जीवन का क्या मूल्य है?" भगवान मुस्कुराए और उसे एक लाल रंग का चमकदार पत्थर दिया। फिर बोले, "इस पत्थर की कीमत का पता लगाओ, लेकिन ध्यान रहे, इसे बेचना मत। जब तुम इसकी वास्तविक कीमत जान लोगे, तब तुम्हें अपने जीवन का मूल्य भी समझ आ जाएगा।"

व्यक्ति पत्थर लेकर सबसे पहले एक फल वाले के पास गया और पूछा, "भाई, क्या तुम इस पत्थर को खरीदोगे? इसकी क्या कीमत होगी?" फल वाले ने पत्थर को ध्यान से देखा और कहा, "मुझसे दस संतरे ले जाओ और यह पत्थर मुझे दे दो।" व्यक्ति को यह सुनकर आश्चर्य हुआ, लेकिन उसने भगवान की बात को याद रखा और पत्थर बेचने से इनकार कर दिया। फिर वह एक सब्ज़ी वाले के पास गया और वही सवाल किया। सब्ज़ी वाले ने कुछ देर पत्थर को देखा और बोला, "इस पत्थर के बदले तुम मुझसे एक बोरी आलू ले सकते हो।" व्यक्ति को यह सुनकर थोड़ा अजीब लगा, लेकिन वह फिर भी चुपचाप आगे बढ़ गया।

इसके बाद वह एक सुनार की दुकान पर गया, जहाँ कई तरह के आभूषण रखे थे। सुनार ने जब वह पत्थर देखा, तो उसकी आँखें चमक उठीं। उसने बड़े ध्यान से पत्थर का निरीक्षण किया और फिर कहा, "मैं तुम्हें एक करोड़ रुपये दूंगा, यह पत्थर मुझे दे दो!" व्यक्ति यह सुनकर हैरान रह गया। उसने माफ़ी मांगी और बताया कि वह यह पत्थर नहीं बेच सकता। सुनार ने फिर कहा, "अच्छा, मैं तुम्हें दो करोड़ रुपये दूंगा, बस यह पत्थर मुझे दे दो!" व्यक्ति और भी अधिक चकित हो गया, लेकिन उसने फिर भी मना कर दिया और आगे बढ़ गया।

अंत में वह एक हीरे के व्यापारी के पास पहुँचा। व्यापारी ने जैसे ही पत्थर देखा, वह स्तब्ध रह गया। उसने पत्थर को पूरे दस मिनट तक ध्यान से परखा, फिर एक मलमल के कपड़े में लपेटकर अपने माथे से लगा लिया। फिर बोला, "यह कोई साधारण पत्थर नहीं, बल्कि इस दुनिया का सबसे दुर्लभ और अनमोल रत्न है! इसे दुनिया की सारी दौलत मिलकर भी नहीं खरीदा जा सकता!" यह सुनकर व्यक्ति अवाक रह गया। वह तुरंत भगवान के पास पहुँचा और अपनी पूरी यात्रा का वर्णन किया। फिर उसने पूछा, "हे प्रभु, अब आप ही बताइए, मेरे जीवन का मूल्य क्या है?" भगवान मुस्कुराए और बोले, "फल वाले, सब्ज़ी वाले, सुनार और हीरे के व्यापारी ने तुम्हें तुम्हारे जीवन की कीमत पहले ही बता दी थी। कुछ लोग तुम्हें साधारण पत्थर समझेंगे, तो कुछ लोग तुम्हें बेशकीमती रत्न मानेंगे। मनुष्य की असली कीमत वही पहचान सकता है, जो उसका सही मूल्य समझता हो। इसलिए कभी निराश मत हो, क्योंकि हर व्यक्ति अनमोल होता है, बस उसे अपनी काबिलियत को पहचानने और निखारने के लिए धैर्य और परिश्रम की आवश्यकता होती है।"

शिक्षा:- इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि हमारी असली कीमत हमेशा हर किसी को समझ नहीं आती। कुछ लोग हमें कम आँकते हैं, जबकि कुछ हमें अत्यंत मूल्यवान समझते हैं। जीवन में धैर्य और मेहनत से हम अपनी वास्तविक काबिलियत को पहचान सकते हैं और उस व्यक्ति तक पहुँच सकते हैं जो हमें सही मूल्य देगा। इसलिए कभी निराश न हों और अपने गुणों को निखारने का निरंतर प्रयास करें।

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📜 प्रेरणाप्रद कहानी

शीर्षक:-
कर्म और भाग्य

कहानी:- एक चाट वाला था, जो हमेशा ग्राहकों से घुलमिलकर बातें करता। जब भी उसके पास जाओ, तो ऐसा लगता जैसे वह हमारा ही इंतज़ार कर रहा हो। उसे हर विषय पर चर्चा करना पसंद था, चाहे राजनीति हो, समाज की बातें हों या फिर रोज़मर्रा की ज़िंदगी के मुद्दे। कई बार उससे कहा जाता कि भाई, चाट जल्दी बना दिया करो, देर हो जाती है, मगर उसकी बातचीत कभी खत्म नहीं होती। एक दिन यूँ ही बातों-बातों में कर्म और भाग्य पर चर्चा शुरू हो गई।

मुझे उसकी सोच जानने की उत्सुकता हुई, तो मैंने सीधा सवाल दाग दिया—"आदमी मेहनत से आगे बढ़ता है या भाग्य से?" उसने मुस्कुराते हुए मेरी ओर देखा और बोला, "आपका किसी बैंक में लॉकर तो होगा?" मैंने कहा, "हाँ, है।" फिर उसने जवाब दिया, जिसने मेरे दिमाग़ के सारे भ्रम दूर कर दिए। वह बोला, "लॉकर की चाबियाँ ही इस सवाल का जवाब हैं। हर लॉकर की दो चाबियाँ होती हैं—एक आपके पास और एक बैंक मैनेजर के पास। आपकी चाबी परिश्रम है और मैनेजर की चाबी भाग्य। जब तक दोनों चाबियाँ नहीं लगतीं, तब तक ताला नहीं खुलता।"

फिर वह रुका और ज़रा गंभीर होकर बोला, "आप कर्मयोगी हैं और ऊपर वाला मैनेजर। आपको अपनी चाबी घुमाते रहनी चाहिए, यानी मेहनत करते रहनी चाहिए। कौन जाने भगवान कब अपनी चाबी लगा दे! लेकिन अगर ऊपर वाला अपनी चाबी लगा रहा हो और आपने अपनी मेहनत वाली चाबी न लगाई हो, तो ताला खुलने से रह जाएगा।" उसकी यह बात मेरे मन में गहरी उतर गई। मैंने सोचा कि कितनी साधारण, लेकिन कितनी सटीक बात कही है इस चाट वाले ने।

यह उदाहरण समझाते हुए वह फिर मुस्कुराया और बोला, "इसलिए कर्म करते रहो, क्योंकि भाग्य भरोसे बैठे रहने से कुछ नहीं मिलेगा। अगर ताला खोलना है, तो अपनी चाबी भी सही समय पर लगानी होगी।" उसकी बातों में एक गहरा संदेश था, जिसे सुनकर मैं सोचने लगा कि सच में, मेहनत और भाग्य दोनों की अपनी अहमियत है, लेकिन मेहनत हमारी अपनी चाबी है, जो हमारे हाथ में है।

शिक्षा:- कर्म करते रहिए, क्योंकि भाग्य आपकी मेहनत का ही परिणाम है। अगर आप परिश्रम नहीं करेंगे, तो भाग्य भी आपका साथ नहीं देगा। अपने सपनों को पूरा करने के लिए बस भाग्य के सहारे न रहें, बल्कि पूरी लगन से मेहनत करें। जब कर्म और भाग्य मिलेंगे, तभी सफलता का ताला खुलेगा।

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📜 प्रेरणाप्रद कहानी

शीर्षक:
कर्मों का खेल

कहानी: एक समय की बात है, एक गरीब लकड़हारा जंगल में सूखी लकड़ियाँ खोज रहा था। उसके साथ उसका गधा भी था, जो बोझा ढोने में उसकी मदद करता था। लकड़ियाँ बटोरते-बटोरते उसे समय का बिल्कुल ध्यान नहीं रहा और दिन कब ढल गया, यह पता ही नहीं चला। जब वह संभला तो देखा कि शाम गहरा चुकी थी और वह अपने गाँव से बहुत दूर निकल आया था। तभी मौसम भी खराब होने लगा, जिससे उसकी चिंता और बढ़ गई। अब वापस लौटना संभव नहीं था, इसलिए वह जंगल में ही रात बिताने के लिए कोई सुरक्षित जगह ढूँढने लगा। तभी उसे जंगल में एक साधु की कुटिया नजर आई। खुशी-खुशी वह अपने गधे के साथ वहाँ पहुँचा और साधु से रात बिताने के लिए स्थान माँगा। साधु ने स्नेहपूर्वक उसका स्वागत किया और भोजन-पानी के साथ आराम करने की व्यवस्था भी कर दी।

लकड़हारा रात को सोने की तैयारी कर ही रहा था कि उसे एक समस्या ने घेर लिया। उसने लकड़ियों को बाँधने के लिए अपनी सारी रस्सी इस्तेमाल कर ली थी, जिससे अब उसके पास गधे को बाँधने के लिए कोई रस्सी नहीं बची थी। यह सोचकर वह चिंतित हो गया कि कहीं गधा रात में इधर-उधर भटक न जाए। उसकी परेशानी को देखकर साधु मुस्कुराए और उसे एक अनोखी युक्ति बताई। उन्होंने कहा, "तुम्हें गधे को बाँधने की जरूरत नहीं, बस उसके पैरों के पास बैठकर रोज की तरह रस्सी बाँधने का नाटक कर दो। गधा इसे सच मान लेगा और अपनी जगह से नहीं हिलेगा।" लकड़हारा पहले तो चकित हुआ, लेकिन कोई और उपाय न देखकर उसने साधु की बात मान ली और गधे को बाँधने का नाटक कर सो गया।

सुबह सूरज की पहली किरणें जंगल में फैलीं, पक्षियों की चहचहाहट शुरू हो गई और लकड़हारा नींद से जागा। उसकी पहली चिंता अपने गधे की थी। वह भागकर बाहर आया और देखा कि गधा उसी जगह खड़ा था जहाँ उसने उसे छोड़ा था। उसे बड़ी राहत मिली और वह साधु को धन्यवाद देकर गाँव लौटने के लिए तैयार हुआ। लेकिन जब उसने गधे को आगे बढ़ाने की कोशिश की तो गधा अपनी जगह से टस से मस होने को तैयार नहीं था। लकड़हारे ने उसे खूब खींचा, डाँटा-डपटा, लेकिन गधा टस से मस नहीं हुआ। यह देखकर साधु हँसे और बोले, "अरे भाई, पहले गधे को खोलो तो सही!" लकड़हारा चौंक गया और बोला, "महाराज, मैंने तो उसे बाँधा ही नहीं, फिर खोलूँ क्या?" साधु ने मुस्कुराते हुए कहा, "रस्सी भले ही न बाँधी हो, लेकिन बन्धन तो डाला था। जैसे बाँधने का दिखावा किया था, वैसे ही खोलने का भी नाटक करना होगा।"

लकड़हारा चकित था, लेकिन उसने साधु की बात मानी और झूठ-मूठ रस्सी खोलने का अभिनय किया। आश्चर्य की बात यह थी कि जैसे ही उसने यह किया, गधा तुरंत चल पड़ा। लकड़हारा यह देखकर हैरान रह गया। तब साधु ने उसे समझाया, "यही कर्मों का खेल है। हम अपने कर्मों को भले ही भूल जाएँ, लेकिन उनके प्रभाव से बच नहीं सकते। हर कर्म का फल अवश्य मिलता है, और जब तक हम उसे स्वीकार कर उसके अनुसार नया कर्म नहीं करते, तब तक हम उससे मुक्त नहीं हो सकते।"

शिक्षा: यह कहानी हमें सिखाती है कि कर्म का प्रभाव गहरे तक होता है, भले ही वह प्रत्यक्ष दिखे या न दिखे। जैसे गधा अपने मानसिक बन्धन में बँध गया था, वैसे ही हम भी अपने पुराने विचारों, आदतों और कर्मों के प्रभाव में बँधे रहते हैं। जब तक हम उन बन्धनों को पहचानकर उनसे मुक्त नहीं होते, तब तक आगे नहीं बढ़ सकते। इसलिए हमें हर कर्म को सोच-समझकर करना चाहिए और अपने जीवन में बदलाव लाने के लिए सही समय पर सही निर्णय लेना चाहिए।

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📜 प्रेरणाप्रद कहानी

शीर्षक:
एक धनी किसान

कहानी: एक समय की बात है, एक गांव में एक धनी किसान रहता था। उसे अपने पूर्वजों से अपार संपत्ति मिली थी, लेकिन अधिक धन-संपदा के कारण वह बेहद आलसी हो गया था। उसका अधिकांश समय हुक्का पीने और इधर-उधर बैठकर बातें करने में बीतता था। उसकी इस लापरवाही का फायदा उसके नौकर-चाकर और रिश्तेदार उठा रहे थे। नौकर अपना काम ढंग से नहीं करते थे और चोरी-छिपे सामान ले जाते थे, जबकि उसके अपने सगे-संबंधी भी उसकी संपत्ति को धीरे-धीरे हड़पने में लगे थे। किसान को इस सबकी कोई चिंता नहीं थी, क्योंकि उसे लगता था कि उसकी संपत्ति कभी खत्म नहीं होगी।

एक दिन किसान का एक पुराना मित्र उससे मिलने आया। उसने जब किसान के घर की हालत देखी तो बहुत दुखी हुआ। उसने किसान को समझाने की कोशिश की, लेकिन उस पर कोई असर नहीं हुआ। तब मित्र ने एक तरकीब निकाली और कहा कि वह उसे एक ऐसे महात्मा के पास ले जाएगा, जो अमीर बनने का रहस्य जानते हैं। किसान यह सुनकर उत्सुक हो गया और महात्मा से मिलने चला गया। महात्मा ने उसे बताया कि हर सुबह सूर्योदय से पहले एक हंस आता है, लेकिन जैसे ही कोई उसे देखने की कोशिश करता है, वह गायब हो जाता है। जो भी उस हंस को देख लेता है, उसका धन निरंतर बढ़ने लगता है।

किसान को यह बात बड़ी रोचक लगी। अगले दिन वह सूर्योदय से पहले उठकर खलिहान पहुंचा और वहां उसने देखा कि उसका एक संबंधी चुपचाप अनाज के बोरे में हाथ साफ कर रहा है। किसान ने उसे पकड़ लिया, जिससे वह शर्मिंदा होकर क्षमा मांगने लगा। फिर वह गौशाला पहुंचा, जहां उसका एक नौकर दूध चुराते हुए पकड़ा गया। किसान ने उसे डांटा और घर की सफाई करने का आदेश दिया। इस तरह वह रोज सुबह जल्दी उठकर हंस की खोज करने लगा। धीरे-धीरे नौकर और रिश्तेदार सतर्क हो गए और चोरी-चकारी बंद कर दी। नौकर ईमानदारी से काम करने लगे और घर में पहले से अधिक स्वच्छता और अनुशासन आ गया। किसान का स्वास्थ्य भी सुधरने लगा, क्योंकि अब वह हर दिन सुबह घूमने-फिरने लगा था।

धीरे-धीरे किसान को महसूस हुआ कि उसकी संपत्ति बढ़ने लगी है, लेकिन वह हंस उसे अभी तक नहीं दिखा। वह फिर महात्मा के पास गया और शिकायत की कि उसे अब तक हंस के दर्शन नहीं हुए। महात्मा मुस्कुराए और बोले, "तुम्हें हंस के दर्शन हो चुके हैं, पर तुम उसे पहचान नहीं पाए। वह हंस कोई और नहीं, बल्कि परिश्रम है। तुमने मेहनत शुरू की, अनुशासन अपनाया और अपनी जिम्मेदारी को समझा। यही सच्चा धन है, जो हमेशा बढ़ता रहेगा।" किसान को तब समझ आया कि सच्ची समृद्धि आलस्य से नहीं, बल्कि परिश्रम और जागरूकता से ही आती है।

शिक्षा: इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि सफलता और समृद्धि का असली रहस्य परिश्रम में छिपा होता है। अगर हम मेहनती और अनुशासित रहेंगे, तो न केवल हमारा धन बढ़ेगा, बल्कि हमारा स्वास्थ्य भी सुधरेगा और जीवन अधिक सुखमय बनेगा।

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