कहानियाँ जो जिंदगी बदल दे


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रुकावटे आती रहेगी और हम आगे बढ़ते रहेंगे !

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'नक्श फरियादी है, किसकी शोख़ी-ए-तहरीर का
कागज़ी है पैरहन , हर पैकर-ए-तस्वीर का..'

इस्मत आपा से हिन्दी और उर्दू दोनों बराबरी से मोहब्बत करते हैं।उनकी कहानियां बख्तरबंद रूढ़ियों पर गहरी चोट पहुँचाती हैं।अपनी पैनी नज़र से परिवेश को टटोल उसे हूबहु पेश करने में उन्हें महारत हासिल थी। दिक्कत तलब बात बस इतनी थी कि सच्चाई का रुख हम सख्त नापसन्द करते हैं। ख़ुद के गिरेबां में देखने के बजाय हम दूसरों पर तोहमत लगाते हैं। इस्मत चुगताई पर भी तमाम तोहमतें लगीं। लिहाफ़ कहानी के लिए उन पर बकायदा मुकदमा हुआ , जिसका किस्सा जग जाहिर है। उनकी बेबाकी की तमाम नजीरें हमारे पास हैं। उनमें से एक 'इस्मत आपा' में दर्ज है :

"हम इतने सारे बच्चे थे कि हमारी मां को हमारी सूरत से कै आती थी । एक के बाद एक हम उनकी कोख़ को रौंदते-कुचलते चले आये थे । उलटियां और दर्द सह-सहकर वह हमें एक सज़ा से ज़्यादा अहमियत नहीं देती थीं।कमउम्री में ही फैलकर चबूतरा हो गयी थीं। पैंतीस बरस की उम्र में वह नानी भी बन गयीं और सज़ा-दर-सज़ा झेलने लगीं। हम बच्चे नौकरों के रहमो-करम पर पलते थे और उनके हिले-मिले हुए थे।"

उनका ये बयान जड़ जमाई रूढ़ियों से पर्दा उठाता है। सच को बेरहमी के साथ चुटीले अंदाज में कहना उनकी खासियत थी। इस अंदाज से बात कहने में उन्होंने खुद को भी कभी बख्शा नहीं।

उनकी आत्मकथा 'काग़ज़ी है पैरहन' उनके परिवेश और समाज पर गहरी नज़र रखती है। एक पूरे समय और समाज को जिन्दा और बेबाक तरीके से बयान करना इसे ख़ास बनाता है। इसके जरिये उनकी शख्सियत को जानना बेहद दिलचस्प है। इसे पढ़ते हुए आप सकून की आगोश में रौशन ख़्याली से तर-बतर होते रहते हैं। बेलौस लिखी गई ये आत्मकथा खुदमुख्तारी का परचम है।




*🏦❤️🎉समय बैंक 🎉❤️🏦*

स्विट्जरलैंड में पढ़ने वाली एक छात्रा ने बताया -

स्विट्जरलैंड में पढ़ाई के दौरान, मैंने अपने स्कूल के पास एक मकान किराए पर लिया था। मकान मालकिन क्रिस्टीना एक 67 वर्षीय एकलौती बूढ़ी महिला थी, जो सेवानिवृत्त होने से पहले एक माध्यमिक विद्यालय में शिक्षक के रूप में काम कर चुकी थी। स्विट्जरलैंड की पेंशन बहुत अच्छी है, उसे बाद के वर्षों में भोजन और आश्रय के बारे में चिंता नहीं करने के लिए पर्याप्त है। एक दिन मुझे पता चला कि उसने एक 87 वर्षीय एकल बूढ़े व्यक्ति की देखभाल करने का काम पाया है। मैंने उस महिला से पूछा कि क्या वह पैसे के लिए काम कर रही है। उसके जवाब ने मुझे चौंका दिया: "मैं पैसे के लिए काम नहीं कर रही, बल्कि मैं अपना समय 'समय बैंक' में रख रही हूँ, और जब मैं अपने बुढ़ापे में चल नहीं सकूंगी, तो मैं इसे वापस ले सकती हूँ।"

पहली बार जब मैंने "समय बैंक" की इस अवधारणा के बारे में सुना, तो मैं बहुत उत्सुक हुई और मकान मालकिन से और पूछा। "समय बैंक" की अवधारणा स्विस फेडरल सामाजिक सुरक्षा मंत्रालय द्वारा विकसित एक वृद्धावस्था पेंशन कार्यक्रम है। लोगों ने बुजुर्गों की देखभाल करने के लिए 'समय' बचा लिया और जब वे बूढ़े हो गए, या बीमार या आवश्यक देखभाल के लिए जब जरुरत हुई वे इसे वापस ले सकते हैं। आवेदक स्वस्थ होना चाहिए, संवाद करने में अच्छा और प्यार से भरा होना चाहिए। रोज उन्हें बुजुर्गों की देखभाल करनी होती है, जिन्हें मदद की ज़रूरत होती है। उनके सेवा घंटों को सामाजिक सुरक्षा प्रणाली के व्यक्तिगत 'समय' खातों में जमा किया जाता है। वह सप्ताह में दो बार काम पर जाती थीं, हर बार दो घंटे बिताती थीं, बुजुर्गों की मदद करती थीं, खरीदारी करती थीं, उनके कमरे की सफाई करती थीं, उन्हें धूप सेंकने के लिए ले जाती थीं, उनसे बातें करती थीं।

नियमानुसार सेवा के एक वर्ष के बाद, "समय बैंक" सेवा देने वाले व्यक्ति के काम के घंटे की गणना करता है और उसे एक "समय बैंक कार्ड" जारी करता है। जब उसे अपनी देखभाल करने के लिए किसी की आवश्यकता होती है, तो वह "समय और ब्याज" को वापस लेने के लिए अपने "समय बैंक कार्ड" का उपयोग कर सकती है। सूचना सत्यापन के बाद, "समय बैंक" अस्पताल या उसके घर पर उसकी देखभाल करने के लिए स्वयंसेवकों को नियुक्त करता है।

एक दिन, मैं स्कूल में थी और मकान मालकिन ने फोन किया और कहा कि वह खिड़की से पोंछा लगा रही थी और वह स्टूल से गिर गई। मैंने जल्दी से छुट्टी ली और उसे इलाज के लिए अस्पताल भेज दिया। मकान मालकिन का टखना टूट गया था और उसे थोड़ी देर बिस्तर पर रहने की जरूरत पड़ी। जब मैं उसकी देखभाल के लिए अपने स्कूल से छुट्टी के लिए आवेदन करने की तैयारी कर रही थी, तो मकान मालकिन ने मुझसे कहा कि मुझे उसकी चिंता करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उसने पहले ही "समय बैंक" को एक निकासी अनुरोध प्रस्तुत कर दिया है। दो घंटे से भी कम समय में "समय बैंक" ने एक नर्सिंग कर्मी को मकान मालकिन की देखभाल के लिए भेज दिया।

अगले एक महीने तक, देखभाल नर्सिंग कर्मी ने मकान मालकिन की रोज़ देखभाल की, उसके साथ बातचीत की और उसके लिए स्वादिष्ट भोजन बनाया। देखभालकर्ता की सावधानीपूर्वक देखभाल के तहत, मकान मालकिन ने जल्द ही अपना स्वास्थ्य ठीक कर लिया। ठीक होने के बाद, मकान मालकिन "काम" पर वापस चली गई। उसने कहा कि वह "समय बैंक" में अधिक समय बचाने का इरादा रखती है, क्योंकि वह अभी भी स्वस्थ है।

आज, स्विट्जरलैंड में, बुढ़ापे का समर्थन करने के लिए "समय बैंकों" का उपयोग एक आम बात बन गई है। यह न केवल देश के पेंशन खर्च को बचाता है, बल्कि अन्य सामाजिक समस्याओं को भी हल करता है। कई स्विस नागरिक इस तरह के वृद्धावस्था पेंशन के बहुत समर्थक हैं।

स्विस पेंशन संगठन द्वारा किए गए सर्वेक्षण से पता चलता है कि स्विस के आधे से अधिक लोग भी इस प्रकार की वृद्धावस्था देखभाल सेवा में भाग लेना चाहते हैं। स्विस सरकार ने "समय बैंक" पेंशन योजना का समर्थन करने के लिए कानून भी पारित किया। वर्तमान में एशियाई देशों में "घरों में अकेले रहने वाले बूढ़े लोगों" की संख्या बढ़ रही है और यह धीरे-धीरे एक सामाजिक समस्या बन गई है। स्विट्जरलैंड शैली "समय बैंक" पेंशन हमारे लिए एक अच्छा विकल्प हो सकता है।

कृपया इस अवधारणा को अधिक से अधिक साझा करें, ताकि भारत सरकार भी इस तरह की योजना को शीघ्र लागू करे।






बोलने का हक मेरी बेटी को भी नहीं है। यदि हर सास अपनी बहू में छिपी हुई बेटी व सहेली ढूंढ लेगी उस दिन उसका घर स्वर्ग बन जाएगा।आज मैं मेरी बहू के बिना एक दिन नहीं रह सकती व मेरी बहू मेरे बिना एक दिन नहीं रह सकती है। जब भी पीयर जाती है दो घंटे में वापस चली आती है पियर में भी वह यही कहती है कि मेरी सास को तकलीफ होगी। इसलिए मुझे जल्दी जाना है। अब तुम सोच लो इससे बड़ा सुख एक सास के लिए क्या हो सकता है।
उसने आगे बताया कि दोस्त मुझे माफ करना मगर जैसा कि तुमने बताया तुम अपनी बहू के साथ नाइंसाफी कर रही हो। सास का रोल छोड़कर मां के रोल में आकर देख तेरा घर भी स्वर्ग बन जाएगा। तुम जो काम जोर, जबरदस्ती व दबाव बनाकर करवाना चाहती हो, वो सारे काम, वह प्रेम से और बेहतर तरीके से कर लेगी इसलिए मेरी तेरे से हाथ जोड़कर विनती है की अब घर जाकर अपनी बहू में छुपी हुई बेटी को पहचानना। तब तेरा यहां आना ज्यादा सार्थक होगा और मुझे भी संतुष्टि प्राप्त होगी।
सरला भावावेश में अपनी बहू को हाथ जोड़े हुए सारी बात बताते हुए रो रही थी उसके साथ साथ सरला की बहू, उसका बेटा व पति भी रो रहे थे। सुधा ने सरला के दोनों हाथ अपने हाथ में लेकर रोते हुए बोली मां आप ऐसा क्यों सोचती हो मैं तो आपकी बेटी पहले से थी वह आज भी हूं आज मैंने मेरी सास को मां के रूप में प्राप्त कर लिया है मेरा जीवन धन्य हो गया है। परिवार के सभी सदस्य ने एक दूसरे के आंसू पोंछे, एक दूसरे के गले लगे। आज लगा इस घर में स्वर्ग उतर आया।


वो रात को अपनी बहू को टेबलेट देकर दूध पिला कर सुलाकर मेरे पास आई।
पूजा के इस व्यवहार से मैं बहुत दुखी हुई। मैं सोचने लगी की पूजा ने अपनी यह क्या स्थिति बना रखी है। पूजा ने अपनी बहू को सर चढ़ा रखा है । वह खुद घर में नौकरानी बनकर रह गई है । मैं दिन भर में कुढती रही। मुझे पूजा पर बहुत गुस्सा आ रहा था जिसे मैंने दिन भर दबा कर रखा मगर रात को जैसे ही वह मेरे से बात करने के लिए आई मेरा गुस्सा फूट पड़ा। मैंने उसे कहा की पूजा तूने यह क्या स्थिति बना रखी है। बहू को बहू के तरीके से रखना चाहिए, तुमने जरूरत से ज्यादा उसे छूट दे रखी है जिसका नतीजा है कि आज तू घर में नौकरानी की तरह रह रही है और तेरी बहू महारानी बनी है। मैं आवेश में सासु की अहमियत के बारे में व बहू को नियंत्रण में रखने के बारे में बहुत कुछ पूजा से उल्टा सीधा बोल गई मगर पूजा ने हंसी मजाक में उस बात को टाल दिया। उसने फिर माहौल हल्का बनाने के लिए कॉलेज के जमाने की बातें करने लग गई ।उस रात भी हम करीब दो बजे तक बातें करते रहे। मैंने पूजा को कहा कि तुम सो जाओ कल तुम्हें फिर बहू के सामने साबित करने के लिए नौकरानी बन कर काम करना पड़ेगा।वह हल्के से मुस्कुराकर सो गई।
सुबह करीब छः बजे किचन में बर्तनों की आवाज सुनकर मेरी नींद खुली तो मेरे मुंह से अनायास निकल गया की पूजा नौकरानी आज फिर काम पर लग गई है लेकिन जैसे ही मैंने करवट बदली तो मैं देख कर आश्चर्यचकित रह गई। पूजा मेरे पास ही घोड़े बेच कर सो रही थी। तब किचन में कौन है,मुझे जिज्ञासा हुई । मैं उठकर किचन में गई तो देखा कि पूजा की बहू खुशबू नहाकर तैयार होकर चाय नाश्ता तैयार कर रही थी। मेरे को देखते ही उसने मेरे चरण स्पर्श किए व मुझे बोली की आप इतनी जल्दी क्यों उठे रात को बहुत देर तक बातें की होगी ।आप थोड़ी टाइम और सो जाओ मगर मैं सो ना सकी। मेरी समझ में कुछ नहीं आया। कुछ समय बाद पूजा भी उठ गई।उसने मुझे कहा कि जल्दी से तैयार हो जाओ नाश्ता कर आज हम शहर घूमने जाएंगे। पूरा दिन लगेगा इसलिए नाश्ता दबाकर कर लेना।हम दोनों नहाकर तैयार हुई तब तक टेबल पर नाश्ता लग चुका था। पूजा की बहू ने बहुत स्वादिष्ट नाश्ता बनाया था ।मैंने भरपेट नाश्ता किया। तब तक पूजा की बहू ने एक बड़े टिफिन में सबका लंच पैक कर दिया जो हम साथ लेकर चले थे। पूजा की बहू गाड़ी ड्राइव कर रही थी। मुझे अगली सीट पर बैठाया गया। वह पूरे रास्ते मुझे शहर के विशिष्ट मार्ग व विशिष्ट स्थानो की जानकारी देती जा रही थी। उसनेे शहर के सभी दर्शनीय स्थल बड़े प्रेम से हमें बताएं। दोपहर में एक शानदार बगीचे में हमने बहुत लजीज लंच किया। लंच पूजा की बहू ने बहुत स्वादिष्ट बनाया था। उसके बाद शहर के बाकी दर्शनीय स्थल देखकर हम रात्रि को करीब आठ बजे घर पहुंचे। तब तक थक कर चूर हो गए थे मगर पूजा की बहू ने घर आते ही कपड़े बदल कर फटाफट डिनर तैयार कर दिया ।वह हमें बड़े प्रेम से मनुहार कर कर के थकी हुई होने के बावजूद डिनर करवाया। रात को हमें दूध गर्म कर पीने को दे गई।उस पूरे दिन पूजा की बहू ने पूजा को कोई काम नहीं करने दिया। उसने रात को डिनर के टेबल पर साफ घोषणा कर दी कि अब अगले तीन दिन तक पूजा को घर का कोई काम नहीं करना है। पूरा समय अपनी सहेली को देना है। पूजा ने भी अपनी बहू का आदेश शिरोधार्य कर लिया और उसके बाद वो तीन दिन हम दोनों ने खूब बातें करके निकाले। मैंने देखा पूजा व उसकी बहू के बीच मां बेटियों से ज्यादा प्यार था। दोनों एक दूसरे के बिना रह नहीं सकती थी। मुझे उन दोनों के बीच एक पल भी कभी नहीं लगा कि वो दोनों सास बहू है।घर का वातावरण हर वक्त खुशनूमा। इन पांच दिनों में पूजा की बहू ने मेरी सारी गलतफहमीया दूर करदी।
यहां आने के दिन की पूर्व रात्रि को मैंने पूजा से हाथ जोड़कर माफी मांगी की उस दिन मैंने आवेश में आकर तुझे व तेरी बहू को बहुत कुछ कह दिया था। मैं गलत थी। तेरी बहू लाखों में एक है। भगवान करें तेरी बहू जैसी बहू सबको मिले। पूजा ने मुझे बताया कि मेरी जैसी बहू सबको मिलती है मगर हम बहू की कदर करना नहीं जानते हैं। जैसे ही हमारे घर में बहू आती है । हमारे में अपने आप सासपना जन्म ले लेता है जिससे सारा मामला बिगड़ जाता है। हम बहू को कभी भी बेटी या सहेली के रूप में नहीं लेते हैं। बस यही वजह है कि घर में शांति नहीं रहती है। हम यह तो अपेक्षा करते हैं कि मेरी बेटी ससुराल में सुखी रहे, उस पर कोई पाबंदी नहीं हो, जैसा वह चाहे वैसा करें, उसकी सास उसके साथ मां बेटी सा व्यवहार करें व उसको खाने, पीने, पहनने, घूमने व फिरने की पूरी आजादी हो जबकि इसके विपरीत हम अपनी बहू से यह अपेक्षा करते हैं कि जैसा हम कहें उसकी पालना करें, हमारी पाबंदियों में जिए, हम चाहे वैसा करे। बस यहीं सब गड़बड़ हो जाती है ।मेरे घर में बहू को बेटी से ज्यादा मान्यता दी जाती है। मेरे घर के सारे फैसले मेरी बहू करती है जिसमें


बना है ।सुधा की सास बोली मुझे पता है। मैंने आज तेरी पसंद के आइटम बनाए हैं। और हां तुम आज सलवार सूट में बहुत सुंदर लग रही हो। लंच खत्म कर सुधा की सास ने आदेश सुनाया की आज का डिनर सभी बाहर लेंगे व कल से सुबह की चाय व नाश्ता वो स्वयं बनाएगी । सुबह सब अपनी सुविधा से उठेगें। लंच व डिनर की जिम्मेदारी सुधा की होगी जिसमें भी उसका सहयोग रहेगा व आज से घर की सारी जिम्मेदारी सुधा की होगी। अब मैं थक गई हूं उम्र भी हो गई है इसलिए घर के सारे फैसले सुधा लेगी जिसकी पालना हम सबको करनी है।
सुधा की सास के इस बदले हुए व्यवहार पर स्वयं सुधा,उसके पति रवि व उसके ससुर हैरान थे मगर किसी में इसका कारण पूछने की हिम्मत नहीं थी। लंच के बाद अपने कमरे में सुधा व सुधा का पति आये तो सुधा का पति सुधा से बोला कि आज तूने ऐसा क्या जादू कर दिया है की मां तेरी मुट्ठी में हो गई है। सुधा बोली मुझे भी कुछ पता नहीं चल रहा है कहीं ऐसा तो नहीं है यह तूफान आने से पहले की शांति हो मगर यदि ऐसा भी है तो अच्छा है।
रात्रि का भोजन पूरे परिवार ने शहर के सबसे अच्छे व महंगे रेस्टोरेंट में किया जिसमें भी सुधा की मनपसंद सब्जियां मंगाई गई । रात को सुधा एवं उसके पति ने बहुत सोचा की सुधा की सास में एकाएक इतना भारी बदला कैसे आ गया।
कल रात को ही सुधा की सास करीब पांच दिन अपनी सहेली पूजा के घर रह कर आई थी और उसके बाद उसमें यह परिवर्तन नजर आया जिससे उन दोनों ने अनुमान लगाया कि इस परिवर्तन का कोई न कोई कारण पूजा के घर से संबंधित होना चाहिए मगर सुधा और उसका पति रवि इस बारे में सरला से बात करने की स्थिति में नहीं थे।
उस दिन के बाद सुधा की सास में लगातार परिवर्तन आता गया। वो सुधा को अपनी बेटी की तरह व्यवहार करने लगी उस पर लगी सारी पाबंदियां हटा दी गई। सबके साथ हिलमिल कर बात करने लगी ।सुधा को तो मानो जन्नत नसीब हो गई।
आखिर एक दिन डाइनिंग टेबल पर सुधा ने हिम्मत कर अपनी सास से इस परिवर्तन का कारण पूछ ही लिया तो पहले तो उसकी सास मुस्कुराई फिर बोली कि मैं भी सोच रही थी कि आप लोग मुझसे इस बारे में कब बात करोगे।
सुधा की सास ने सुधा की तरफ दोनों हाथ जोड़कर बोली बेटी तुम मुझे माफ कर दो सच में मैंने तेरे पर अत्याचार किए हैं। मैंने तुझे सिर्फ अपनी बहु बनाना चाहा मैंने कभी भी तुझ में अपनी बेटी ढूंढने की कोशिश नहीं की ।जिस कारण मेरे घर का वातावरण हमेशा बोझिल बना रहा मगर मैं खुश थी क्योंकि मेरा अहम
संतुष्ट हो रहा था ।मुझे कभी भी एक पल के लिए भी नहीं लगा कि तुम इतनी पाबंदियों में कैसे जी रही हो। सच में यदि मैं पांच दिन के लिए पूजा के घर नहीं जाती तो मुझ में यह परिवर्तन कभी नहीं होता और मैं यह जान भी नहीं पाती की एक हंसता खेलता परिवार कैसा होता है।
उसने आगे बताया कि जब वह पूजा के घर गई व दरवाजा खटखटाया तब पूजा की बहू खुशबू सलवार सूट पहनकर बिना दुपट्टा सिर पर डाले दरवाजा खोल कर जब मेरे चरण स्पर्श करने लगी तो मुझे बहुत बुरा लगा। मुझे लगा कि मैं गलत घर में आ गई हूं। पूजा की बहू से मैंने कम से कम सिर पर दुपट्टा रखने की उम्मीद जरूर पाल रखी थी मगर ऐसा नहीं होता देख मुझे मन ही मन बहुत गुस्सा आया। खैर जैसे तैसे मैंने गुस्से को काबू में किया। घर में जाकर पूजा से मिली बहुत खुश हुई कई सालों बाद उससे मिली थी। वो मेरे कॉलेज के समय की सबसे घनिष्ठ सहेली थी। समय चक्र ने दोनों को अलग अलग कर दिया था। फिर दोनों अपनी अपनी जिम्मेदारी मैं इस तरह फंस गई कि एक दूसरे को याद नहीं कर पाई। इसलिए उस दिन दोनों बहुत सारी बातें करना चाह रही थी। रात्रि का खाना खाकर मैं और पूजा उसके कमरे में बातचीत शुरू ही की थी कि पूजा की बहू ने अपनी सास को आवाज देकर बताया कि उसको बहुत तेज सिर दर्द हो रहा है। उसकी आवाज सुनते ही पूजा एकदम खड़ी हो गई और बाॅम की शीशी लेकर उसकी बहू के कमरे में जाकर उसके माथे पर मालिश करने लगी। मैं यह देखकर कर हक्का बक्का रह गई। उसके बाद उसने हाथों हाथ चाय बना कर खुशबू को सिर दर्द कम करने की गोली दी व उसे सुला दिया और बोली कि सुबह जल्दी उठने की कोई जरूरत नहीं है। सुबह की चाय और नाश्ता में अपने आप बनाऊंगी। मुझे पूजा की यह बात बहूत नागवार गुजरी लेकिन मैं चुप रही। दूसरे दिन मैं यह देखकर दंग रह गई की पूजा रात को करीब दो बजे तक मेरे साथ गप्पे मारने के बावजूद सुबह छः बजे उठकर सुबह की चाय बना कर अपनी बहू को पीला चुकी थी व नहाकर नाश्ता तैयार कर मुझे उठाया। वह मुझे तैयार होने का कहकर नाश्ते की ट्रे लेकर अपनी बहू के कमरे में चली गई। मैं तैयार होकर आई तब तक वह मेरा नाश्ते की टेबल पर इंतजार कर रही थी। हमने मिलकर नाश्ता किया। उसके बाद पूरे दिन पूजा ने अपनी बहू को बिस्तर से उठने नहीं दिया। घर का सारा काम उसने किया। यहा तक की अपनी बहू के कपड़े भी उसने धोये। सुबह का खाना व रात का खाना भी उसी ने बनाया।


🙋‍♀बहू में छिपी हैं बेटी🙋‍♀
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बेडरूम के दरवाजे पर खड़खड़ाहट होने पर सुधा एकदम नींद से जागी और साड़ी का पल्लू सिर पर रखकर घड़ी की तरफ नजर डाली तो पता चला कि सुबह के छः बज रहे हैं। सुधा एकदम घबरा गई उसको सुबह पांच बजे उठना था लेकिन लेट हो गई। उसे लगा कि आज सासू मां के कड़वे प्रवचन अवश्य सुनने को मिलेंगे।उसने डरते हुए दरवाजा खोला और स्पष्टीकरण मैं बोल पड़ी मां जी रात को सिर दर्द होने के कारण देरी से नींद आई थी इसलिए उठने में थोड़ी देर हो गई। कोई बात नहीं बेटा सासु सरला की शहद भरी मीठी बात सुन सहसा सुधा को विश्वास नहीं हुआ।उसने देखा उसकी सासू मां चाय लेकर आई थी। चाय की ट्रे सुधा को पकड़ाकर बोली चाय पी लो और थोड़े समय और आराम कर लो और उसने बेडरूम का दरवाजा बाहर से बंद कर दिया। सुधा चाय की ट्रे हाथ में लिए असमंजस में पड़ गई।उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि उसे आज उसकी सास ने बेटा कहकर पुकारा , चाय बना कर दे गई, वह उसे आराम करने का कह गई ।

सुधा की शादी हुए पांच साल हो चुके थे इन पांच सालों में सुधा की सास ने कभी भी सुधा को चाय बना कर नहीं दी , कभी उसकी तबीयत के बारे में नहीं पूछा था। सुधा की सास बेहद सख्त मिजाज की सास के अर्थों में सास थी।
सुधा को रोज सुबह पांच बजे उठना आवश्यक था। यदि किसी दिन सुधा पांच मिनट भी लेट हो जाती तो बाहर सासु मां के कड़वे प्रवचन शुरू हो जाते थे। सुधा को घर का सारा काम करना पड़ता,घर में भी पल्लू सिर पर रखना आवश्यक था, घर के बाहर जाने के लिए सुधा को सास की अनुमति आवश्यक थी, बिना सास की इच्छा के घर में पत्ता भी नहीं हिल सकता था ।सुधा का पति बेहद संवेदनशील इंसान था सुधा को बेहद प्यार करता था। सुधा पर मां के द्वारा लगाई जाने वाली पाबंदीयों से वह भी परेशान था। इसी तरह सुधा का ससुर बेहद सुलझा हुआ इंसान था मगर घर में इन दोनों की नहीं चलती थी। इन दोनों को भी जैसा सुधा की सास कहती थी वैसा ही करना पड़ता था ।सुधा का पति व ससुर बहुत अच्छे इंसान थे सुधा का हर तरह से ख्याल रखते थे इसलिए सास की इतनी पाबंदियों के बावजूद सुधा घर में खुश थी। बेशक उसे सास का व्यवहार बिल्कुल पसंद नहीं था मगर वह कुछ नहीं कर सकती थी।
सुधा व सुधा के पति को सरला
के आज के व्यवहार पर घोर आश्चर्य हो रहा था। वे सोच रहे थे कि आज सूरज किधर निकला। सुधा चाय पीकर वापस लेट गई एक झपकी ली थी कि उसे किचन में बर्तनो की आवाज आने लगी। सुधा तुरंत उठ कर किचन में पहुंची तो देखा कि उसकी सास सबके लिए नाश्ता तैयार कर रही थी। सुधा को देखकर उसकी सास ने कहा तुम लोग जल्दी नहा धोकर नाश्ते की टेबल पर आ जाओ। सुधा को फिर आश्चर्य हुआ कि आज यह क्या हो रहा है। सुधा की सास कभी किचन में कोई काम नहीं करती। किचन का सारा काम सुधा को ही करना होता था वह नहाकर तैयार होकर नाश्ते की टेबल पर पहुंची तब तक उसका पति व ससुर भी तैयार होकर नाश्ते की टेबल पर आ गए थे। सुधा की सास ने अपने हाथों से सबको नाश्ता सर्व किया व खुद भी एक प्लेट में नाश्ता लेकर बैठ गई। सुधा को फिर आश्चर्य हुआ कि आज नाश्ता सुधा का मनपसंद बना हुआ था। सुधा उसका पति रवि व उसके ससुर सभी विस्मित थे किआज आखिरी हो क्यारहा हैं मगर कोई कुछ नहीं बोल रहा था ।अचानक सुधा की सास ने चुप्पी तोड़ी और अपने बेटे से बोली नाश्ते के बाद तुम सुधा को लेकर बाजार जाना और सुधा को दो चार इसकी मनपसंद के सलवार सूट दिला कर लाना, दिन भर घर में साड़ी में रहने से अच्छा है कि सलवार सूट में रहे ।उसने नाश्ते की टेबल से उठते उठते यह भी कह दिया है की आज का लंच वही तैयार करेगी।
सुधा की खुशी का तो पारावाह नहीं रहा। जब शादी करके आई थी तब वह चाहती थी कि कम से कम घर में उसे सलवार कुर्ता पहनने की छूट मिल जाए मगर सुधा की सास ने पहले दिन ही आदेशात्मक आज्ञा जारी कर दी थी कि शादी के बाद घर में भी उसे साड़ी ही पहननी होगी व हर वक्त सिर पर पल्लू रखना होगा मगर आज अचानक सुधा को सलवार सूट पहनने की छूट मिल जाने पर सुधा बहुत खुश थी ।वह पति के साथ बाजार जा कर चार ड्रेस लेकर आ गई ।घर आकर उसने देखा कि उसकी सास व ससुर डाइनिंग टेबल पर उन दोनों का इंतजार कर रहे थे ।सुधा की सासु बोली जल्दी से साड़ी बदल कर ड्रेस पहनकर डाइनिंग टेबल पर आ जाओ बहुत जोर की भूख लगी है। सुधा अपने कमरे में जाकर ड्रेस पहनी मगर बाहर आने की उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी। तभी सास ने फिर आवाज देकर कहा कि बेटा जल्दी आओ भूख लग रही है। सुधा को विवश होकर ड्रेस में डाइनिंग टेबल पर आना पड़ा। आज वह ड्रेस में बहुत असहज महसूस कर रही थी। लंच में खीर पूरी बनी थी जो सुधा की मनपसंद डीश थी ।सब्जियां सुधा की पसंद की बनी थी। सुधा की सास बड़े प्रेम से सबको लंच सर्व कर रही थी। डाइनिंग टेबल पर एक बार फिर निस्तब्धता छा गई। सुधा हिम्मत कर बोली मांजी आज लंच बहुत स्वादिष्ट


लगातार हो रही असफलता से निराश कभी नही होना चाहिए,

क्योंकि कभी कभी गुच्छे की आखरी चाभी ताला खोल देती है !

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